छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"खजाने की बात करते हो तो हमारा प्रत्येक किला खजाना ही है। तेरे बूढ़े शरीर में यदि अभी भी कुछ ताकत बची हो तो अल्लाह के घर जाने से पहले शिवाजी-सम्भाजी के किले जीतकर दिखा।" सम्भाजी ने चुनौती भरे शब्दों में कहा। "सम्भाऽऽ, हमारा सवाल मजहब की आरज़ू और खजाने की चाहत से परे है। हमें हिन्दुस्तान की राजनीति आगे भी चलानी है। इसलिए शासक होने के नाते तुमसे साफ साफ जवाब चाहता हूँ। बोलऽ, तुम्हारे साथ और उन दो शिया राजाओं के साथ हमारे कौन-कौन से लोग खुफिया के तौर पर शामिल थे। इस एक सवाल का ठीक ठीक जवाब दोगे तो अभी भी अपनी प्यारी जिन्दगी बचा सकते हो।" "हमारी मौत का फतवा तो तुम्हारे काजी ने कल दोपहर में ही जारी कर दिया है।" "काज़ी, मौलवी, फतवा आदि तो हम राजनीतिज्ञों की कटारों के मखमली आवरण होते हैं। जब चाहें कोई भी फतवा खारिज कर दें। फतवे का अमल करना न करना हमारी मुट्ठी में होता है। बोलऽऽ, हमारे कौन कौन से धोखेबाज तुम्हारे माथ मिले हुए थे। वे कौन हैं जिन्होंने पिछले नौ वर्षों तक दक्खिन के जंगलों में मुझे फकीर की तरह भटकाया और उन बदमाश मक्कारों ने तेरे जैसे जहन्नमी की मदद की? कौन हैं वे लोग?" सम्भाजी राजा का पेट पीठ से सट गया था। पिछले कुछ दिनों से पेट में अन्न का एक टुकड़ा तक न गया था। उनके होंठ सूख गये थे। आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था। स्वास्थ्य एकदम खराब हो गया था। इस अवस्था में भी सम्भाजी राजा बेहोशी में हँसे और बादशाह से बोले, "जो जवाब तुम्हें चाहिए वह हम कभी भी नहीं दे सकते-" "क्यूँ?" "हम अपने शत्रु पर सामने से तलवार चलाते हैं और अपने मित्रों की पीठ बचाकर रखते हैं। हम ऐसा उनकी पीठ थपथपाकर शाबासी देने के लिए करते हैं, धोखे से उनकी पीठ में खंजर भोंकने के लिए नहीं।" सम्भाजी के आखिरी उत्तर से बादशाह जलभुन उठा। उसे सम्भाजी राजा से कोई भी बात मालूम नहीं हो सकी। इससे वह बहुत चिढ़ गया था। बन्दीखाने के चारों कोनों में धुआँ फेंकती मशालें बादशाह के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही थीं। पास में रखी सुराही का पानी उसने गट गट पिया। उसने ध्यानपूर्वक सामने देखा। सामने कवि कलश आपाद मस्तक जकड़े हुए रखे गये थे। बादशाह को वहाँ अधिक देर तक ठहरना नहीं था। वह उठा और तेज कदमों से कैदखाने से बाहर आ गया। मशालों के उजाले में सैकड़ों आँखें उसकी ओर घूर सम्भाजी :: 753