छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें" 'कौन अघोरघट और कौन कापालिक ?' ' इस नये प्रसंग को लेकर बालाजी पन्त की मुद्रा अपना लुभावनापन छोड़कर क्रोधावेश में भयानक हो गयी। वे चिल्लाए- " 'जो हमेशा तुम पर अपना जादू चलाता है। जिसने अपनी पापी बुद्धि मे तुम्हें पागल बना दिया है। जो भैंसे की गीली पीठ पर सवारी करता है, जो काले जादू के काले-कारनामे करता है।' ' " 'मगर है कौन ?' ' " 'जो अघोरी कार्य के लिए बैतालों के झुंड बुलाता है।' ' संभाजी ने मुस्कराते हुए येसूबाई की ओर देखा। फिर दानों जोर से हँसने लगे। अपनी हँसी को रोकते हुए शम्भूराजा ने कहा, " 'औरों की तरह आपको भी संशय और ईर्ष्या के साँप ने डस लिया है क्या ? इसीलिए कविराज आपको पराये लगने लगे हैं क्या ?' ' " 'सच कहूँ युवराज ! इस सन्दर्भ में मैं अपने अष्टप्रधानों को जरा भी दोष नहीं देता। यह कलुष के रूप में शिवाजी महाराज के स्वराज्य में कलि प्रविष्ट हो गया है। यह पूरी तरह मच है। यदि ऐसा नहीं होता तो आपके जैसा कर्तव्यपरायण राजकुमार ने इतनी भयंकर चाल न चली होती।' ' " 'कैसी चाल ? बालाजी काका !' ' " 'किसी अच्छे व्यक्ति के बुरी संगति में पड़ने से बुराइयों का प्रभाव पड़ता ही है। इस श्रृंगारपुर के परिसर में मांस मच्छी खाने वाले, जादू-टोना करने वाले अधर्मी शाक्तपन्थियों ने उत्पात मचा रखा है। आप जैसा विद्वान युवराज उनका अन्धा शिकार हो जाय, यह बड़ा दुर्भाग्य है।' ' " 'बालाजी काका मनुष्य के आचरण की शुद्धता के लिए ही प्रत्येक धर्म और पथ प्रयत्न करते हैं। कालान्तर में लोग धर्म को वशवर्ती बनाकर अनुचित मार्ग को अपनाते हैं। किन्तु धर्म का विकृत रूप वास्तविक धर्म नहीं होता। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि केवल शाक्त पन्थियों में ही सारी बुराइयाँ हैं और वैदिक धर्म इससे पूर्णतया मुक्त हैं।' ' शम्भूराजा ने आगे कहा, " 'शाक्त पंथ को हम कुछ अन्य नहीं समझते। वह तो वस्तुतः जगदम्बा की, शक्ति की ही पूजा है। उसमें हमारे भोसले खानदान की कुलदेवी तुलजा भवानी भी हैं। वे शस्त्रधारिणी और दुष्टों का नाश करने वाली हैं। उसे भोग लगता है तो उसी रक्त मांस का," बोलते-बोलते शम्भूराजा क्षणभर के लिए रुके फिर भरे हुए गले से बोले, " 'आज हमारा कोई अपराध न होने पर भी बहुतों की उपहास करने वाली दुष्ट दृष्टि हमें शाप देती है। बहुत से लोगों के द्वेष के, शाप के और उनकी गालियों के हम शिकार होते हैं। ऐसी दुष्ट प्रवृत्ति का सामना करने के लिए किसी शक्ति के आशीर्वाद और वरदान की आवश्यकता तो पड़ेगी ही, बालाजी काका।' ' सम्भाजी • 83