छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंयोग से शिवाजी महाराज कुछ समय बाद राजापुर की लड़ाई पर आये। उन्होंने एक जौहरी की भाँति हीरे को पहचाना। उन्होंने रखमाबाई से कहा कि वे बालाजी को स्वराज्य की सेवा में ले रहे हैं। अपने परिवार के साथ घटित हादसे से वे अभी तक उबर नहीं पायी थीं। उनके करुण रुदन से महाराज का हृदय द्रवित हो उठा। महाराज ने बालाजी की माता को अभयदान देते हुए कहा, ‘‘माताजी आपके तीन पुत्र हैं। मुझे आप अपना चौथा पुत्र मानिए। आपका सुपुत्र स्वराज्य की चिन्ता करेगा, मैं आपकी चिन्ता करूँगा।’’ अपनी ईमानदारी, परिश्रम और कार्य कौशल से बालाजी पन्त राजसत्ता की एक एक सीढ़ी चढ़ते ऊपर गये। स्वराज्य के ब्राह्मण प्रधानों के प्रच्छन्न विरोध की अनदेखी करके महाराज ने बालाजी को सचिव (चिटणीस) बना दिया और राज्य के सभी किलों और गढ़ों का कार्यभार उन्हें सौंप दिया। बालाजी पन्त ने प्रत्येक किले पर अपनी प्रभु जाति के योग्य और कर्मठ व्यक्तियों को नियुक्त किया। उन्हें महत्त्वपूर्ण पद दिये। अष्टप्रधानों में दो दल बन गये थे। एक ओर बालाजी आवजी चिटणीस तो दूसरी ओर अण्णाजी दत्तो और मोरोपन्त पिंगले थे। प्रभु और ब्राह्मण जाति में आश्चर्यजनक आन्तरिक बैर था। किन्तु शिवाजी महाराज के कठोर अनुशासन और निर्णायक दृष्टि के सम्मुख किसी की कुछ न चलती थी। बालाजी आवजी को शम्भुराजा से पहले से ही बहुत स्नेह था। शम्भुराजा मातृ विहीन पुत्र और बड़े महाराज हमेशा अपने राज-काज में व्यस्त रहते थे। ऐसी स्थिति में पहले राजगढ़ में और बाद में रायगढ़ में शम्भुराजा की हित चिन्ता करने वाले जो इने गिने लोग थे उनमें बालाजी आवजी एक थे। सागौन का वृक्ष जिस गति से बढ़ता है, शम्भुराजा भी उसी गति से दिनोंदिन हृष्ट-पुष्ट होते जा रहे थे। राज्याभिषेक के पूर्व बड़े महाराज ने रायगढ़ और स्थानीय राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए कहा था। शम्भुराजा ने बड़े उत्साह और बड़ी कुशलता से चार वर्षों तक यह कार्य सफलतापूर्वक सँभाला। कर्नाटक की कोलार और चिक्कबालापुर की जागीर भी स्वयं सँभाली थी। आगे अथणी, रायबाग गोलकुंडा से लेकर हुबली, फोंडा और अकोला तक कर्नाटक और गोवा की सीमा तक धावा बोला था। कुतुब शाह के दीवान मादण्णा से मित्रता करके बहुत सा धन लूटकर रायगढ़ ले आये थे। शम्भुराजा के इस वीरता भरे उत्साह से बालाजी पन्त बहुत प्रभावित हुए थे। कुछ समय बाद बालाजी पन्त शम्भुराजा के साथ भोजन कर रहे थे। सुस्वादु भोजन से उनका मन बहुत प्रसन्न था। परन्तु भोजन करते-करते यकायक जैसे मुँह में कोई पत्थर का टुकड़ा आ गया। बालाजी ने क्रुद्ध स्वर में पूछा- ‘‘वह अघोरघट कपालिक कहाँ है?’’ 82 सम्भाजी