भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

और सरदार स्वभावतः ईर्ष्या करने लगे थे। जेजुरी के खंडोबा आवजी हरि के पूज्य देवता थे। एक बार उनके सपने में मल्हारी मार्तंड के आने की घटना घटी। तभी अपनी सेवा के अनुशासन को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने बीमार मालिक के सामने नियमानुसार प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। अवकाश लेकर वे जेजुरी गये और खंडोबा की पूजा करके जंजीरा वापस लौट आये। इसके पश्चात् सिद्दी बाबशीखान की तबीयत और भी खराब हो गयी। आवजी हरि से ईर्ष्या करने वाले मुस्लिम कर्मचारियों को अच्छा अवसर मिल गया। उन्होंने षड्यन्त्र रचकर यह कहना शुरू किया कि आवजी ने जेजुरी जाकर मालिक पर कुछ जादू टोना किया है। वे एक ही बात दोहराते थे-‘आवजी ने सुल्तान पर भयानक जादू टोना किया है। वह राज्य को डुबाना चाहता है।‘' संयोग बाबशीखान मर गया। गद्दी पर कम उम्र का नया सिद्दी बैठा। कर्मचारियों ने उससे भी शिकायत करनी आरम्भ की कि आवजी ही सुल्तान की मृत्यु का कारण है। नये सिद्दी ने शिकायत को सच मान लिया। आवजी ने हाथ पैर जोड़कर सुल्तान से स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की प्रार्थना की किन्तु सिद्दी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत नये सिद्दी ने जहर का प्याला आवजी के हाथ में देकर उसे पीने के लिए सख्त आदेश दिया। आवजी और उनके भाई खण्डोजी को बोरे में बाँधकर समुद्र में फेंक दिया गया। हब्शी लोगों ने आवजी हरि का घर लूट लिया। उन्होंने आवजी के बालाजी चिमणाजी और श्यामजी तीनों पुत्रों को गुलाम के बच्चे मानकर ईरान इराक में बेचने का निश्चय किया। एक रात आवजी की पत्नी रखमाबाई के भाग्य फूट गये। उस समय बालाजी केवल ग्यारह वर्ष के थे। अभागी माता के साथ तीनों बच्चे नाव पर चीख-चिल्ला रहे थे। भरे समुद्र और आसमान को देख देखकर भाग्य और भगवान से सहायता की प्रार्थना कर रहे थे। भाग्य का फेर था या कुछ और स्वयं प्रकृति ही उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़ी। नाव राजापुर के किनारे तक पहुँची थी तभी अचानक हवा उल्टी दिशा में बहने लगी। विवश होकर नाविकों को किनारे की ओर जाना पड़ा। यह योगायोग ही था कि रखमाबाई के भाई विसाजी शंकर राजापुर में व्यापार करते थे। वे ऐन मौके पर बहन की सहायता के लिए दौड़ पड़े। नाविकों और कर्मचारियों से बहुत-बहुत प्रार्थना करके और बहुत-सा धन उनकी झोली में डालकर विसाजी ने अपनी बहन और भांजों को मुक्त करा लिया। एक बार बालाजी ने अपने मोतियों जैसे सुन्दर अक्षरों में शिवाजी महाराज को एक पत्र लिखा-‘महाराज! हिन्दवी स्वराज्य के एक सिपाही के रूप में सेवा करने से मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।’ सम्भाजी :: 81