सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
दादूजी को तो भक्ति - ज्ञान - वैराग्य मूलतः प्राप्त था, इसलिए उन्हें गुरु की खोज नहीं करनी पड़ी। सद्गुरु ने उनके पास आने की कृपा की और गुरु की कमी पूरी कर दी, क्योंकि सद्गुरु की प्राप्ति भी बहुत आवश्यक है। एकादश वर्ष की अवस्था में गुरुदेव ने पुनः दादूजी को दर्शन दिए। यह इस बात का संकेत था कि शिक्षा पूर्ण हो गई और अब दादूजी को चाहिये कि वे दूसरों को शिक्षा - उपदेश दें। यह सब दो सिद्धों का मौन वार्तालाप था। ज्ञानपुंज दादूजी ने गुरुदेव के संकेतानुसार श्रद्धालु जनता के समक्ष प्रवचन करना आरम्भ कर दिया। वे निर्गुण ब्रह्म तथा योग की गूढ़ साधना की व्याख्या अत्यंत सरल एवं सर्वग्राह्य भाषा में प्रस्तुत करने लगे । “तत्वमसि”, “सोहं”, “एको हम् द्वितीयो नास्ति” आदि वेद के महावाक्यों का सारगर्भित अर्थ बड़ी सहजता से कर देते थे। उनके अकाट्य तर्क को सुनकर बड़े - बड़े महापंडित विस्मित हो जाते थे। सारा नागर समाज उनपर गर्वान्वित था। प्रवचन के अतिरिक्त दादूजी साखी एवं पदों का प्रयोग भी करते थे। उनकी काव्य रचना शक्ति स्वयं-स्फूर्त थी। इसलिए उनके साखी एवं पदों को समझने में साधारण जनता को किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं होता था। स्वतंत्र विचरण - एक दिन श्री दादूजी ने सद्गुरु की प्रेरणा का अन्तर्मन में अनुभव किया - 'तुम अपने नगर में ही सीमित न रहो, बाहर निकलो। असंख्य जीवों का निस्तार करने के लिए तुम संसार में आए हो।' ऐसी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर वे भक्ति का प्रचार करने के लिए अहमदाबाद से निकल पड़े । श्री दादूदयालजी महाराज पेटलाद, आबू पर्वत होते हुए राजस्थान में पहुँचे । वहाँ से करडाला, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़, करौली, सांभर, आमेर, नरायणा, भैराणा तथा सीकरी आदि स्थानों पर श्री महाराजजी ने अपनी दिव्य अमृतमयी वाणी की वर्षा करी । सीकरी में 40 दिनों तक अकबर ने भी इनके सत्संग का लाभ प्राप्त किया।
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