सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन
दादूजी को तो भक्ति - ज्ञान - वैराग्य मूलतः प्राप्त था, इसलिए उन्हें गुरु की खोज नहीं करनी पड़ी। सद्गुरु ने उनके पास आने की कृपा की और गुरु की कमी पूरी कर दी, क्योंकि सद्गुरु की प्राप्ति भी बहुत आवश्यक है। एकादश वर्ष की अवस्था में गुरुदेव ने पुनः दादूजी को दर्शन दिए। यह इस बात का संकेत था कि शिक्षा पूर्ण हो गई और अब दादूजी को चाहिये कि वे दूसरों को शिक्षा - उपदेश दें। यह सब दो सिद्धों का मौन वार्तालाप था। ज्ञानपुंज दादूजी ने गुरुदेव के संकेतानुसार श्रद्धालु जनता के समक्ष प्रवचन करना आरम्भ कर दिया। वे निर्गुण ब्रह्म तथा योग की गूढ़ साधना की व्याख्या अत्यंत सरल एवं सर्वग्राह्य भाषा में प्रस्तुत करने लगे । “तत्वमसि”, “सोहं”, “एको हम् द्वितीयो नास्ति” आदि वेद के महावाक्यों का सारगर्भित अर्थ बड़ी सहजता से कर देते थे। उनके अकाट्य तर्क को सुनकर बड़े - बड़े महापंडित विस्मित हो जाते थे। सारा नागर समाज उनपर गर्वान्वित था। प्रवचन के अतिरिक्त दादूजी साखी एवं पदों का प्रयोग भी करते थे। उनकी काव्य रचना शक्ति स्वयं-स्फूर्त थी। इसलिए उनके साखी एवं पदों को समझने में साधारण जनता को किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं होता था। स्वतंत्र विचरण - एक दिन श्री दादूजी ने सद्गुरु की प्रेरणा का अन्तर्मन में अनुभव किया - 'तुम अपने नगर में ही सीमित न रहो, बाहर निकलो। असंख्य जीवों का निस्तार करने के लिए तुम संसार में आए हो।' ऐसी दिव्य प्रेरणा से प्रेरित होकर वे भक्ति का प्रचार करने के लिए अहमदाबाद से निकल पड़े । श्री दादूदयालजी महाराज पेटलाद, आबू पर्वत होते हुए राजस्थान में पहुँचे । वहाँ से करडाला, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़, करौली, सांभर, आमेर, नरायणा, भैराणा तथा सीकरी आदि स्थानों पर श्री महाराजजी ने अपनी दिव्य अमृतमयी वाणी की वर्षा करी । सीकरी में 40 दिनों तक अकबर ने भी इनके सत्संग का लाभ प्राप्त किया।
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श्री दादूदयालजी महाराज के उपदेशों से हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही सम्प्रदायों में आपसी प्रेम, मैत्री एवं भाईचारे की भावनाओं में वृद्धि हुई । अनेक वर्षों तक आपने ज्ञान तथा भक्ति पूर्ण मधुर प्रवचनों द्वारा श्री दादूजी ने जनसमुदाय को प्रभावित किया तथा लोगों को कल्याण - पथ पर आगे
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन बढ़ाया । साथ ही वे स्वयं अपनी साधना में भी रत रहते थे । कभी - कभी आत्म - रमण के उद्देश्य से श्री महाराजजी दीर्घकाल तक एकान्तवास किया करते थे । महामंत्र सत्यराम द्वारा अनंत प्राणीमात्र व भूत प्रेतों का उद्धार श्री दादूजी महाराज ने किया । सत्यराम महामंत्र इसलिए है कि यह सभी मंत्रों का सार है, तात्विक ज्ञानरुप चारों वेदों ( ऋग्वेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद, सामवेद ) के रहस्यों सदैव अकीलित है, अक्षुण्ण है, प्रज्वलित एवं नित्य चैतन्य रहनेवाला है । इसमें “राम नाम सत्य है” का रहस्य भी अंतर्निहित है । श्री दादूजी महाराज हठयोग, नाड़ीयोग, सामान्य योग तथा साधन योग इन सब तंत्रों में पारंगत थे और इनके रहस्य को वे सरल सुबोध भाषा में जनता के समक्ष प्रस्तुत भी करते थे । वे जानते थे कि सारे वायुमंडल सहित समस्त प्राणी एक ऐसे अनोखे तंत्र में बंधे हुए हैं जिसमें प्रत्येक कामना की सिद्धि तथा सम्पूर्ति के लिए लाखों मंत्र तंत्र रचे हुए हैं । सभी मंत्रों का रहस्य अनावृत करने वाले श्री दादूदयालजी महाराज ने सर्वसाधारण को “सत्यराम” का ऐसा महामंत्र दिया जिसका महत्व अनिर्वचनीय है और जो निरन्तर दैदिप्यमान रहता है । संत शिरोमणि श्री दादूदयालजी महाराज आनंद की वर्षा करते हुए नारायणा पहुँचे । वहां तत्कालीन राजा नारायणदासजी के विशेष आग्रह पर श्री महाराजजी रघुनाथजी के मंदिर में ठहर गए, जहां तीन दिन तक सत्संग का दुर्लभ लाभ राजा तथा प्रजाजनों को प्राप्त हुआ । बाद में श्री महाराजजी ने सात दिन तक त्रिपोलिया के ऊपर एकांत वास किया । आठवें दिन श्री महाराजजी के आसन के निकट एक नाग प्रकट हुआ और फण के द्वारा उन्हें अपने पीछे चलने का संकेत दिया । श्री दादूजी महाराज इसे भगवदाज्ञा समझ कर नाग के पीछे चल पड़े । नाग जल से परिपूर्ण तालाब के ऊपर चला एवं महाराज श्री भी उसके पीछे पधारे । तालाब से होकर नाग एक
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन घने खेजड़ा ( राजस्थानी शमी वृक्ष ) के नीचे रुक गया और उन्हें बैठने का संकेत कर लुप्त होगया । श्री दादूदयालजी महाराज तत्काल इस घटना का आशय समझ गए और पद्मासन लगाकर आत्मचिंतन में लीन होगए । ऐसी आत्म - लीनावस्था में श्री महाराजजी के अंगों से दिव्य तेज विकीर्ण होकर समस्त क्षेत्र को आलोकित करने लगा । दैव प्रेरित होकर राजा नारायणदासजी भी प्रजा वर्ग के साथ उसी स्थान पर आ पहुँचे । सबने महाराज श्री के अंगों से निकलता दिव्य तेज देखा और यह भी देखा कि महाराजजी के आस - पास नाना प्रकार के प्राणी घूम रहे हैं जिनमें कुछ के मुख मनुष्य जैसे तथा शरीर का शेष भाग विभिन्न पशुओं जैसा तथा कुछ के मुख पशुओं जैसे तथा शरीर का शेष भाग मनुष्य जैसा था । ऐसा अनोखा दृश्य देख सभी लोग आश्चर्यचकित होगए और कुछ लोग भयभीत भी हुए । तीसरे दिन सारे विचित्र प्राणी लुप्त होगए तथा स्थिति सामान्य होगई । उसी समय श्री दादूदयालजी महाराज के नेत्र खुले और उन्होंने वरदमुद्रा में "सत्यराम" आशीर्वाद दिया । वाणीजी की रचना - वाणीजी का रचना काल आजसे लगभग 450 वर्ष पूर्व का है । महाप्रभु दादूदयालजी महाराज ने रचना की दृष्टि से कोई स्वतन्त्र काव्य नहीं रचा है; प्रत्युत समय समय पर शरणागत मुमुक्षुजनों को महाराज पद्यमय वाणी में आत्मोपदेश करते, उन्हीं को उनके शिष्यादि ने संग्रहित कर लिए । मोहनदासजी(दफ्तरी), जगन्नाथजी, संतदासजी दादूजी महाराज के अनन्य शिष्य भक्त थे; जो सदा उनकी शरण में रहते थे । शरणागत मुमुक्षुओं को महाप्रभु जो आत्मोपदेश करते, उनको अक्षरशः ये तीनों महात्मा संग्रहित कर लेते थे । उन पद्यों के 'लिपि-संग्रह' का कार्य शिष्य मोहनजी दफ्तरी करते थे, मोहनजी की 'दफ्तरी' संज्ञा इसी कारण पडी थी । दादूजी महाराज अपनी साधना में प्रार्थना का स्थान भी रखते थे । समस्त 'वाणी' संग्रह को
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन शिष्यवर पंडित जगजीवन जी(दौसा) और रज्जब जी ने क्रमानुसार संकलित किया था ।
हस्तलिखित वाणी जी चित्र सौजन्य-महंत रामगोपालदास तपस्वी बाबाजी
इसी तरह उपदेश, साधना, प्रार्थना के साथ-साथ 'श्री दादूवाणी' की रचना होने लगी, जिसको प्रसंगानुसार बाद में रज्जब जी ने प्रकरणों (अंगों- उपांगों) में विभाजित कर क्रमबद्ध किया गया । 'वाणीजी' में दादूजी महाराज के भावों, विचारो तथा निश्चयों का संग्रह है । मुख्यतया इसकी रचना उस
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१. साखी भाग (पूर्वार्ध): गुरु-देव, विरह, परिचय, ज्ञान-योग व साध-महिमा
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समय की बोलचाल की भाषा में की गई है । स्थल विशेषों में अरबी, फ़ारसी, गुजराती, मराठी, सिंधी व् पंजाबी भाषा का प्रयोग हुआ है । इससे सिद्ध होता है कि दादूजी महाराज कई भाषाओं पर अधिकार रखते थे । ‘वाणीजी’ में सभी तरह के शास्त्रीय, वेदांत, योग, सांख्य, उपनिषद व गीता के सिद्धांतों का प्रकरण-विशेष में अच्छा समन्वय है । इससे प्रतीत होता है कि - जिज्ञासुओं ने महाराज से सभी विषयों पर प्रश्न किये थे, उनका उत्तर आपने बड़ी सुगम व प्रांजल भाषा में दिया है । दादूवाणी में माधुर्य की तो अजस्र धारा ही बह चली है । अन्त समय में उनके पट्टशिष्य गरीबदासजी ने प्रश्न किया - “स्वामिन् ! आपने ऐसा मार्ग दिखाया है जो हिन्दू मुसलमानों की सीमित सीमा से आगे का है । किन्तु इसका आगे कैसे निर्वाह होगा ?” महाराज ने कहा - “तुम ऐसा विचार मत करो, जो अपने धर्म में रहेंगे उनकी रक्षा राम करेंगे, और तुम विशेष चाहो तो हमारा शरीर रखलो, जो भी पूछना चाहोगे उसी का उत्तर इससे मिलता रहेगा, तथा ऐसा भी न समझो कि वह शरीर खराब हो जायगा, यह पंच तत्व से बना हुआ नहीं है, यह तो दर्पण में प्रतिबिंबित शरीर के समान है । यदि तुम्हें संशय हो तो हाथ फेर कर देखलो ।” गरीबदासजी ने हाथ फेरा तो शरीर दीपक ज्योति सा प्रतीत हुआ, दीखता तो था किन्तु पकड़ने में नहीं आता था । फिर गरीबदासजी ने कहा - “जब आपने ऐसा देह बना लिया तो कुछ दिन इसे और रखने से तो हम शवपूजक कहलाएंगे जो आपके उपदेश के अनुसार उचित नहीं ।” महाराज बोले - “तो फिर यहां एक बिना तेल - घृत और बत्ती के अखंड ज्योति रहेगी उससे तुम्हारे सभी कार्य सिद्ध होते रहेंगे ।” गरीबदासजी ने कहा - “उस ज्योति के महान् चमत्कार को देखकर यहां जनता का आना जाना अधिक रहेगा जो हमारे साधन में पूर्ण विघ्न बनेगा, हम पंडे बन जाएंगे, अतः यह भी ठीक नहीं है ।” गरीबदासजी की निष्कामता देखकर महाराज प्रसन्न हुए
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और बोले - “जो हमारी वाणी का आश्रय लेकर निर्गुण भक्ति करेंगे, उनकी परब्रह्म रक्षा करेंगे और जो इष्ट - भ्रष्ट होगा, उसे परम - पद नहीं मिलेगा ।” इसी कारण श्री महाराजजी के महाप्रयाण के बाद उनकी वाणी ही सबसे अधिक पूज्यनीय सिद्ध हुई । आज भी दादू - सम्प्रदाय के सभी पूजन स्थलोंमें श्रीवाणीजी का प्रमुख पूजन होता है । कहीं कहीं भक्तजनों ने अपनी भावनानुसार चित्र भी प्रतिष्ठित किए हैं । निजस्वरूप में प्रवेश शनैः शनैः तपोमूर्ति श्री दादूदयालजी महाराज के लीला संवरण का समय आ पहुँचा । परमज्योति से ज्योति का मिलन तो अवश्यंभावी है । उस समय श्री महाराजजी नारायणा में विराजमान थे । संत माधोदासजी के अनुसार - बासुर होय समीप रहे दिन, आवत पालकी पंथ आकाशा । के शर चन्दन छाय सुगन्धित, ल्याय धरे सुर मंदिर पासा ।। ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी वि. सं. 1660, उस दिन चार दिव्य पार्षद पुरुष पालकी लिए हुए आकाश मार्ग से धरा पर उतरे । सभी शिष्यों ने, राजा नारायणदासजी ने तथा उनकी प्रजा ने इस अदभुत दृश्य को देखा । सबने महाराजजी से पालकी के आने का कारण पूछा तब उन्हों ने कहा “कल करिहैं निज लोक प्रवेशा ” दूसरे दिन परम पावन पुण्य तिथि अष्टमी को तीन बार आकाशवाणी द्वारा महाराज श्री को पालकी में बिराजमान होने का निर्देश मिला । श्री महाराजजी शांतभाव से पालकी में बिराजमान हुए । दिव्य पालकी के आने एवं महाराज श्री के निजस्वरूप में प्रवेश का समाचार तो पहले दिन ही पूरे क्षेत्र में फैल चुका था । हजारों, हजारों की संख्या में दूर - दूर से आए भक्त गण नारायणा में श्री महाराजजी के दर्शनार्थ एकत्र होगए । एकत्र विशाल जनसमुदाय के सामने ही श्री महाराजजी ने शांत भाव से पालकी में प्रवेश किया । तब दिव्य पार्षद - पुरुषों द्वारा संचालित वह पालकी ऊपर
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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन उठ कर आकाश मार्ग से होती हुई धीरे धीरे भैराणा पर्वत के एक खोल (वर्तमान दादूखोल) में पहुँची । सारा शिष्यवृंद तथा विशाल जनसमुदाय भी पालकी के पीछे - पीछे वहां पहुँच गया । दादू खोल में पालकी के स्थित होते ही एक अद्भुत दिव्य दृश्य नभ मंडल में दिखाई पड़ा । देव, गंधर्व, किन्नर आदि प्रकट होकर जय जयकार करते हुए पुष्प केशर की वर्षा करने लगे, अप्सराएं यशोगान करती हुई नृत्य करने लगीं । ठीक यही दृश्य श्री महाराजजी के प्राकट्य के दिन भी उपस्थित हुआ था और संयोग से उस दिन भी अष्टमी तिथि थी । सारे भक्तजन इस अनोखे दृश्य को देखकर आश्चर्य, आनंद एवं श्रद्धा से प्लावित हो गए । तत्पश्चात् अचानक पालकी फिर ऊपर उठी और उड़ती हुई भैराणा पर्वत की एक गुफा ( यहां वर्तमान गुफा मंदिर है ) के द्वार तक गई । पालकी के गुफा में प्रविष्ट होने के पूर्व श्री महाराज जी ने दाहिना कर - कमल वरद मुद्रा में उठाकर उच्च स्वर से “संतों ! भक्तों ! सत्यराम” का उद्घोष किया और पालकी गुफा में अंतर्ध्यान होगई । तभी से दादू सम्प्रदाय में “सत्यराम” महामंत्र का प्रयोग आशीर्वादात्मक तथा अभिवादनात्मक दोनों भावों में किया जाता है । जब भी दादू भक्तों को परस्पर अभिवादन करना होता है या आशीर्वाद देना होता है तब अपने सद्गुरुदेव का स्मरण करते हुए “सत्यराम” का उच्चारण करते हैं, अतः यह श्रेष्ठ अभिवादन है । ( परम श्रद्धेय श्री दादूदयालजी महाराज की यह संक्षिप्त जीवनी है )
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श्री स्वामी दादूदयालजी महाराज की वाणी ।। महिमा - महात्म्य ।। ।। दोहा ।। प्रगट कल्प तरु अवनि परि, उदय भयो इक आय । कृतसु दादूदास को मनवांछित फल दाय ॥ 1 ॥ ।। कवित्त ।। अवनि कल्प तरु प्रगट, भई दादू की वाणी । साखी शब्द दोई ग्रन्थ, सुतो बड़ स्कन्द पिछाणीं ॥ साखी स्कन्द में डारि, अंग सैंतीस सुनाऊँ । पद स्कन्द में डारि, सप्त अरु बीस बताऊँ ॥ पच्चीससै पैंसठि साखि, सोउ पुनि साखा । चार सैं चंव्वालीस, पद सोउ उपदाखा ॥ पत्र अक्षर लक्ष कहै साठि, सहज पुनि और गनि । भक्ति पहुप वैराग्य फल, ब्रह्म बीज जगन्नाथ भनिं ॥ 2 ॥ प्रथम सत्ताईस राग पोई, अब मोटी डारा । तामैं छोटी और अंग, सैंतीस बिचारा ॥ पद जू चंव्वालीस चारि, सत ऊपर डलियाँ । उभय सहस शत पंच, साखी इकतीस दुकलियाँ ॥ अब पात सो अक्षर एक लख, साठ सहस पुनि और गन । भक्ति पहुप अरु दर्श फल, ब्रह्म बीज कहै लालजन ॥ 3 ॥ ज्ञान भक्ति वैराग्य भाग, बहु भेद बतायो । कोटि ग्रंथ को मन्त, पन्थ संक्षेप लखायो ॥ विशुद्धि बुद्धि अविरुद्धि, शुद्धि सर्वज्ञ उजागर । परमानंद प्रकाश नाश, बिगदंड महाधर ॥ वर्णबूँद साखी सलिल, पद ललिता सागर हरि । दादूदयालु दिनकर दुती, जिन विमल वृष्टि वाणी करी ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-महिमा महात्म्य भये सम्पूर्ण पद अरु साखी, भक्ति मुक्ति तिनमें सो भाखी । मनसा वाचा बाचै कोई, ताकूँ आवागमन न होई ॥5॥ वाणी दादू दयालु की, सब शास्त्रन को सार । पढे विचारे प्रीती सूं, जे जन उतरे पार ॥ 6 ॥ दादू दीन दयालु की, वाणी विस्वावीस । तिनकूं खोजि विचार करि, अंग धरे सैंतीस ॥ 7 ॥ तिन माहीं जो हारडे, तिनके तिते स्वरुप । कोई विवेकी केलवे, काढै अर्थ अनूप ॥ 8 ॥ वाणी दादू दयालु की, वाणी कंचन रूप । कोई इक सोनी संत जन, घड़ि हैं घाट अनूप ॥ 9 ॥ वाणी दादू दयालु की, वाणी अनुभव सार । जो जन या हृदय धरै, सो जन उतरे पार ॥ 10 ॥ जे जन पढ़े जु प्रीति सूं, उपजे आत्मज्ञान । तिनकूं आनन भास ही, एक निरंजन ध्यान ॥ 11 ॥ जिनके या हृदय बसी, याही में मन दीं । तिनकूं अति मीठी लगी, आठ पहर लैलीन ॥ 12 ॥ वेद पुराण सब शास्त्र, और जीते जो ग्रन्थ । तिनको बोध बिलोइकै, यह काढ्या निज मंथ ॥ 13 ॥ बोले दादू दासजी, साचै शब्द रसाल । तिनकी उपमा को कहै, मानो उगले लाल ॥ 14 ॥ या वाणी सुनि ज्ञान ह्वे, याही तै वैराग्य । या सुन भजन भक्ति बढ़े, या सुन माया त्याग ॥ 15 ॥ या वाणी पढ़ि प्रेम ह्वे, या पढ़ि प्रीति अपार । या पढ़ि निश्चय नाम की, या पढ़ि प्राण अधार ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष । याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥ आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू । कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥ बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर । सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥ अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै । अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥ जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी । जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥ यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी । गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥ दादूवाणी के अंग नाम गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया । परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥ हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता । चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥ माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले । साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥ सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया । पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥ सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा । सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥
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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के राग नाम कालहि मेट सजीवनी, पारस घर आया । उपजन, दया, निर्वैरता, सुंदरि पिव पाया ॥ 6 ॥ कस्तूरी की बॉंस ले, निन्दा परिहरिये । निगुणा नेह निवार कर, हरी बिनती करिये ॥ 7 ॥ साखीभूत बेली बधी, अबिहड़ अंग लागा । अमर भये अरु थिर हुवै, हरि-संगति पागा ॥ 8 ॥ दादू दीनदयाल की, बानी बिस्वाबीस । सकल अंक सो सोध कर, अंग धरे सैंतीस ॥ 9 ॥ इन सैंतीसों अंग में, परमारथ गाया । 'महानन्द' मुक्ता भया, गुरु दादू पाया ॥ 10 ॥ दादूवाणी के राग नाम राग विविध बहु शोध कर, हरि का गुण गाया । साध महामुनि जे भये, परमेश्वर पाया ॥ 1 ॥ प्रथम गौड़ी मालवा, कीया कल्याना । कनड़ा अड़ाणा आण कर, केदार ठाना ॥ 2 ॥ मारू रामकली भली, आशावरि सिन्धूड़ा । देवगन्धार कलिंगडा, परजिया पाया ॥ 3 ॥ भाणमली गायन रली, सारँग सार तोडी । हुसैनी बंगाली गावताँ, ऐसे मन होडी ॥ 4 ॥ नटनारायण सोरठी, गुंड प्रेम अपारा । बिलावल सोहे सदा, सोहे रस सारा ॥ 5 ॥ बसंत भैरूं ललिता भनी, जैतश्री सवाई । धनाश्री और अनन्त की, मिल आरति गाई ॥ 6 ॥
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श्री दादूवाणी-मंगलाचरण आदि अंत हरि सेवही, मिल सबही साधू । इन रागन में पद किये, श्री सतगुरु-दादू ॥ 7 ॥ अंग-रागन का जोड़ यह, महानन्द गाया । गुरु-दादू परसाद तैं, हरि हिरदै पाया ॥ 8 ॥ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरञ्जनं, नमस्कार गुरु देवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥ 1 ॥ परब्रह्म परापरं, सो मम् देव निरंजनम् । निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥ गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परंब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 3 ॥ अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरं । तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 4 ॥ केशराम्बरधरं स्वामी, नूर तेज सुधामयम् । दादू दयालु दया कृत्यं, सर्व विघ्न विनाशन् ॥ 5 ॥ काश्मीर रंजितं वस्त्रं, गौरवर्णं शशीप्रभम् । दधानं श्रीगुरुंदादूं, वंदे कारण विग्रहम् ॥ 6 ॥ जो प्रभु जग में ज्योतिर्मय, कारण करण अभेव । विघ्न हरण मंगलकरण, श्री नमो निरंजन देव ॥ 7 ॥ स्वामी दादू सुमिरिये, गहिये निर्मल ज्ञान । मनसा वाचा कर्मणा, सुन्दर धरिये ध्यान ॥ 8 ॥ स्वामी दादू ब्रह्म है, फेर सार नहिं कोय । सुन्दर ताकों सुमिरतां, सब सिध कारज होय ॥ 9 ॥
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श्री दादूवाणी-मंगलाचरण स्वामीजी सिर ऊपरे, स्वामीजी उर मांहि । स्वामी दादू सारिसा, सुन्दर दूजा नाहिं ॥ 10 ॥ स्वामी दादू दीनदयाल सा, नजर न आया कोय । घडसी सारी मांड में, कर्ता करे सो होय ॥ 11 ॥ सब संतन सौं बीनती, जे सुमिरें जगदीस । हरि गुरु हिरदै में, बसो और हमारे शीश ॥ 12 ॥ हरि वन्दन गुरु रीझहीं, गुरु वन्दन सुख राम । जगन्नाथ हरि गुरु खुशी, करियो जन परनाम ॥ 13 ॥ सदा हमारे रामजी, गुरु गोविंदजी सहाय । जन रज्जब जोख्यों नहीं, विघ्न विलय होय जाय ॥ 14 ॥ नाम लेत नव ग्रह टरें, भजन करत भय जाय । जगजीवन अजपा जपें, सबही विघ्न विलाय ॥ 15 ॥ विघ्न बचें हरि नाम सौं, व्याधि विकार विलाय । ऐसा शरणा नाम का, सब दुख सहजैं जाय ॥ 16 ॥
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दादूराम ।। ॐ परमात्मने नमः ।। सत्यराम ।। श्री दादूदयालवे नमः ।। अथ श्री स्वामी दादूदयाल जी की अनुभव वाणी गुरूदेव का अंग www.dadooram.org अथ गुरुदेव का अंग - १ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्वसाधवा, प्रणामं पारंगत: ।। 1 ।।
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् । निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥ 2 ॥ गुरु प्राप्ति और फल दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद । मस्तक मेरे कर धर्या,दिक्ष्या अगम अगाध ॥ 3 ॥ दादू सतगुरु सहज में, किया बहु उपकार । निर्धन धनवंत करि लिया, गुरु मिलिया दातार ॥ 4 ॥ दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ । दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥ 5 ॥ दादू देखु दयाल की, गुरु दिखाई बाट । ताला कूंची लाइ कर, खोले सबै कपाट ॥ 6 ॥ सद्गुरु सामर्थ्य के अंग दादू सतगुरु अंजन बाहिकर, नैन पटल सब खोले । बहरे कानों सुणने लागे, गूं गे मुख सौं बोले ॥ 7 ॥ सतगुरु दाता जीव का, श्रवण सीस कर नैन । तन मन सौंज संवारि सब, मुख रसना अरु बैन ॥ 8 ॥ राम नाम उपदेश कर, अगम गवन यहु सैन । दादू सतगुरु सब दिया, आप मिलाये ऐन ॥ 9 ॥ सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप । दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥ 10 ॥ साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै । दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥ 11 ॥ सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ । दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥ 12 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू काढै काल मुखि, अंधे लोचन देइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, जीव ब्रह्म कर लेइ ॥ 13 ॥ दादू काढै काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥ 14 ॥ दादू काढै काल मुखि, गूंगे लिये बुलाइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, सुख में रहे समाइ ॥ 15 ॥ दादू काढै काल मुख, मिहर दया करि आइ। दादू ऐसा गुरु मिल्या, महिमा कही न जाइ ॥ 16 ॥ सतगुरु काढै केस गहि, डूबत इहि संसार। दादू नाव चढ़ाइ करि, कीये पैली पार ॥ 17 ॥ भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढै आय। दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढ़ाइ ॥ 18 ॥ दादू उस गुरुदेव की, मैं बलिहारी जाऊँ। जहाँ आसण अमर अलेख था, ले राखे उस ठाऊँ ॥ 19 ॥ ज्ञानोत्पत्ति आत्म मांहै ऊपजै, दादू पंगुल ज्ञान। कृतम् जाइ उलंधि करि, जहां निरंजन थान ॥ 20 ॥ आत्म बोध बँझ का बेटा, गुरु मुखि उपजै आइ। दादू पंगुल पंच बिन, जहाँ राम तहँ जाइ ॥ 21 ॥ गुरु शब्द साचा सहजैं ले मिलै, शब्द गुरु का ज्ञान। दादू हमको ले चल्या, जहाँ प्रीतम का स्थान ॥ 22 ॥ दादू शब्द विचार करि, लागि रहे मन लाइ। ज्ञान गहै गुरुदेव का, दादू सहज समाइ ॥ 23 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दया विनती दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ। भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥ 24 ॥ सतगुरु शब्द बाण दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर। सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥ 25 ॥ दादू सतगुरु मारे शब्द सौं, निरखि निरखि निज ठौर। राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥ 26 ॥ दादू हमको सुख भया, साध शब्द गुरु ज्ञान। सुधि बुधि सोधी समझकर, पाया पद निर्वाण ॥ 27 ॥ सतगुरु शब्द बाण दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ। जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥ 28 ॥ सतगुरु शब्द मुख सौं कह्या, क्या नेड़े क्या दूर। दादू सिष श्रवणहुँ सुण्या, सुमिरण लागा सूर ॥ 29 ॥ करनी बिना कथनी शब्द दूध घृत राम रस, मथि करि काढै कोइ। दादू गुरु गोविन्द बिन, घट घट समझि न होइ ॥ 30 ॥ शब्द दूध घृत राम रस, कोई साध बिलोवणहार। दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥ 31 ॥ घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक सब ही ठौर। दादू वक्ता बहुत हैं, मथि काढैं ते और ॥ 32 ॥ कामधेनु घट घीव है, दिन दिन दुर्बल होइ। गौरू ज्ञान न ऊपजै, मथि नहिं खाया सोइ ॥ 33 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 साचा समर्थ गुरु मिल्या, तिन तत्त दिया बताइ । दादू मोटा महाबली, घट घृत मथि कर खाइ ॥ 34 ॥ मथि करि दीपक कीजिये, सब घट भया प्रकाश । दादू दीवा हाथि करि, गया निरंजन पास ॥ 35 ॥ परमार्था दीवै दीवा कीजिये, गुरुमुख मार्ग जाइ । दादू अपने पीव का, दर्शन देखै आइ ॥ 36 ॥ दादू दीया है भला, दीया करौ सब कोइ । घर में धन्धा न पाइये, जे कर दीया न होइ ॥ 37 ॥ दादू दीये का गुण तेल है, दीया मोटी बात । दीया जग में चाँदणां, दीया चालै साथ ॥ 38 ॥ सत्य गुरु निर्मल गुरु का ज्ञान गहि, निर्मल भक्ति विचार । निर्मल पाया प्रेम रस, छूटे सकल विकार ॥ 39 ॥ निर्मल तन मन आत्मा, निर्मल मनसा सार । निर्मल प्राणी पंच कर, दादू लंघे पार ॥ 40 ॥ परापरी पासै रहै, कोइ न जाणै ताहि । सतगुरु दिया दिखाइ करि, दादू रह्या ल्यौ लाइ ॥ 41 ॥ शिष्य जिज्ञासा जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ । दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥ 42 ॥ मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ । आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥ 43 ॥ भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ । सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥ 44 ॥
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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 सरवर भरिया दह दिसा, पंखी प्यासा जाइ । दादू गुरु प्रसाद बिन, क्यों जल पीवै आइ ॥ 45 ॥ सतगुरु बेपरवाही मान सरोवर मांहिं जल, प्यासा पीवै आइ । दादू दोष न दीजिये, घर घर कहण न जाइ ॥ 46 ॥ गुरु लक्षण दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ । लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥ 47 ॥ दीन गरीबी गहि रह्या, गरवा गुरु गम्भीर । सूक्ष्म शीतल सुरति मति, सहज दया गुरु धीर ॥ 48 ॥ सो धी दाता पलक में, तिरे तिरावण जोग । दादू ऐसा परम गुरु, पाया किहीं संजोग ॥ 49 ॥ दादू सतगुरु ऐसा कीजिये, राम रस माता । पार उतारे पलक में, दर्शन का दाता ॥ 50 ॥ देवै किरका दरद का, टूटा जोड़ै तार । दादू सांधै सुरति को, सो गुरु पीर हमार ॥ 51 ॥ दादू घाइल ह्वै रहे, सतगुरु के मारे । दादू अंग लगाय कर, भौसागर तारे ॥ 52 । दादू साचा गुरु मिल्या, साचा दिया दिखाइ । साचे को साचा मिल्या, साचा रह्या समाइ ॥ 53 ॥ साचा सतगुरु सोधि ले, साचे लीजे साध । साचा साहिब सोधि करि, दादू भक्ति अगाध ॥ 54 ॥ सन्मुख सतगुरु साधु सौं, साईं सौं राता । दादू प्याला प्रेम का, महारस माता ॥ 55 ॥
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