भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-दादूवाणी के अंग नाम या पढ़ि कूँ खोजतां, क्षमा शील संतोष । याही विचारत बुद्धि ह्वे, या धारत जिव मोक्ष ॥ 17 ॥ आदि निरंजन अन्त निरंजन, मध्य निरंजन आदू । कहि जगजीवन अलख निरंजन, तहाँ बसे गुरु दादू ॥ 18 ॥ बषना वाणी बरसणी, बरसो गहर गंभीर । सूकानैं हरिया करे, गुरु वाणी का नीर ॥ 19 ॥ अविचल मंत्र जपे निशि वासुर, अविचल आरती गावै । अविचल इष्ट रहै शिर ऊपरि, अविचल ही पद पावै ॥ 20 ॥ जिनकी वाणी अमृत बखानी, सन्तन मानी सुखदानी । जो सुनकर प्राणी हिरदै आनी, बुद्धि थिरानी उन जानी ॥ यह अकथ कहानी प्रगट प्रवानी, नाहिं न छानी गंगा सी । गुरु दादू आया शब्द सुनाया, ब्रह्म बताया अविनाशी ॥ दादूवाणी के अंग नाम गुरु मिल सुमिरण सों लागा, बिरहा जब आया । परचा पिवजी सों भया, जरना ठहराया ॥ 1 ॥ हैरान देख लय लग रही, निहकर्मी पतिवन्ता । चिंतामणि मन को भई, सूक्ष्म-जन्म अनन्ता ॥ 2 ॥ माया त्यागी, साँच गहि, भेख रु पंथ निराले । साध अंग सब सोध कर, मध मारग चालै ॥ 3 ॥ सारगृही जू विचार कर, विश्वास हरि दीया । पीव पिछाना आपना, समरथ सब कीया ॥ 4 ॥ सब्द सुना श्रवणों धरा, जीवत मिरतक हूवा । सूरातन साहस किया, अरु इन्द्रिय मूवा ॥ 5 ॥

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