भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ । जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥ अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई । दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥ लै लगाने की विधि ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ । दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥ अगम संस्कार पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ । दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥ अध्यात्म योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव । मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥ सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि । लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥ दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण । विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥ मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम । शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥ सूक्ष्म मार्ग किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ । दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥ शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ । चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥ दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार । मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥

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