भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 लय राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै । दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥ राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ । दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥ रस रंग सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा। दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥ अध्यात्म दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ । तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥ अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ। जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥ दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण । सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥ सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन । लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥ सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर । अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥ दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ । यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥ दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल । यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥ दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर । सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥

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