सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-लै का अंग 7 दादू एक सुरति सौं सब रहें, पंचों उनमनि लाग। यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥ 27 ॥ दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग। अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहबा संग ॥ 28 ॥ सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन। सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥ 29 ॥ सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग। दादू पीवैं राम रस, रहें निरंजन लाग ॥ 30 ॥ सूक्ष्म सौंज दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ। जहाँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाइ ॥ 31 ॥ विनती दादू ज्यों वै बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवै राम ॥ 32 ॥ अध्यात्म सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण। गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥ 33 ॥ लय परआतम सो आत्मा, ज्यों जल उदक समान। तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावै पद निर्वाण ॥ 34 ॥ मन ही सौं मन सेविये, ज्यों जल जलहि समाइ। आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 35 ॥ छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसे मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 36 ॥ यों मन तजै शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ। दादू बिसरै देखतां, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥ 37 ॥
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