भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ। दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥ 17 ॥ दादू कौवा बोहित बैस कर, मंझि समंदाँ जाइ। उड़ि उड़ि थाका देख तब, निश्चल बैठा आइ ॥ 18 ॥ यहु मन कागद की गुडी, उड़ी चढ़ी आकास। दादू भीगे प्रेम जल, तब आइ रहे हम पास ॥ 19 ॥ दादू खीला गार का, निश्चल थिर न रहाइ। दादू पग नहीं साँच के, भ्रमै दहदिशि जाइ ॥ 20 ॥ तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ। दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥ 21 ॥ मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद। दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 22 ॥ विषय विरक्ति दादू यों फूटे थैं सारा भया, संधे संधि मिलाइ। बाहुड़ विषय न भूँचिये, तो कबहुँ फूट न जाइ ॥ 23 ॥ दादू यहु मन भूला सो गली, नरक जाणै के घाट। अब मन अविगत नाथ सों, गुरु दिखाई बाट ॥ 24 ॥ दादू मन सुध साबित आपणा, निश्चल होवे हाथ। तो इहाँ ही आनन्द है, सदा निरंजन साथ ॥ 25 ॥ जब मन लागै राम सौं, तब अनत काहे को जाइ। दादू पानी लौन ज्यों, ऐसैं रहै समाइ ॥ 26 ॥ ज्यों जल पैसे दूध में, ज्यों पानी में लौन। ऐसैं आत्माराम सौं, मन हठ साधै कौन ॥ 27 ॥ मन का मस्तक मूंडिये, काम क्रोध के केश। दादू विषय विकार सब, सतगुरु के उपदेश ॥ 28 ॥

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