सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10 करुणा सो कुछ हम थैं ना भया, जा पर रीझे राम । दादू इस संसार में, हम आये बेकाम ॥ 29 ॥ क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ । जन्म अमोलक आपका, चले अकारथ खोइ ॥ 30 ॥ जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नाहिं। दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥ 31 ॥ किया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार । क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भरतार ॥ 32 ॥ इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह । जा कारण जग सिरजिया, सो दादू कछु न कीन्ह ॥ 33 ॥ किया था इस काम कौं, सेवा कारण साज । दादू भूला बंदगी, सज्या न एकौ काज ॥ 34 ॥ दादू विषै विकार सौं, जब लग मन राता । तब लग चित्त न आवई, त्रिभुवनपति दाता ॥ 35 ॥ दादू का जाणूँ कब होइगा, हरि सुमिरण इकतार । का जाणूँ कब छाड़ि है, यह मन विषय विकार ॥ 36 ॥ मन प्रबोध बादि हि जन्म गँवाइया, किया बहुत विकार । यहु मन सुस्थिर ना भया, जहाँ दादू निज सार ॥ 37 ॥ विषय अतृप्ति दादू जनि विष पीवै बावरे, दिन दिन बाढै रोग । देखत ही मर जाइगा, तज विषया रस भोग ॥ 38 ॥ आपा पर सब दूर कर, राम नाम रस लाग । दादू औसर जात है, जाग सके तो जाग ॥ 39 ॥
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