सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन हरि भावनि दादू सब कुछ विलसतां, खातां पीतां होइ। दादू मन का भावता, कहि समझावै कोइ ॥ 40 ॥ दादू मन का भावता, मेरी कहै बलाइ। साच राम का भावता, दादू कहै सुणि आइ ॥ 41 ॥ दादू ये सब मन का भावता, जे कुछ कीजै आन। मन गहि राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 42 ॥ जे कुछ भावै राम को, सो तत कह समझाइ। दादू मन का भावता, सबको कहि बनाइ ॥ 43 ॥ चाणक उपदेश पैंडे पग चालै नहीं, होइ रह्या गलियार। राम रथ निबहै नहीं, खाबे को हुशियार ॥ 44 ॥ पर प्रबोध दादू का परमोधै आन को, आपण बहिया जात। औरों को अमृत कहै, आपण ही विष खात ॥ 45 ॥ दादू पंचों ये परमोध ले, इन्हीं को उपदेश। यहु मन अपणा हाथ कर, तो चेला सब देश ॥ 46 ॥ दादू पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवां होइ। यहु मन राखै जतन कर, साधु कहावै सोइ ॥ 47 ॥ दादू जब लग मन के दोइ गुण, तब लग निपना नांहि। द्वै गुण मन के मिट गये, तब निपनां मिल मांहि ॥ 48 ॥ काचा पाका जब लगै, तब लग अंतर होइ। काचा पाका दूर कर, दादू एकै सोइ ॥ 49 ॥ मध्य निष्पक्ष सहज रूप मन का भया, तब द्वै द्वै मिटी तरंग। ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 50 ॥
- 134 -