सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10
मन दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग। जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥ 51 ॥ हीरा मन पर राखिये, तब दूजा चढै न रंग। दादू यों मन थिर भया, अविनाशी के संग ॥ 52 ॥ सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन। दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥ 53 ॥ दादू पाका मन डोलै नहीं, निश्चल रहै समाइ। काचा मन दह दिशि फिरै, चंचल चहुँ दिशि जाइ ॥ 54 ॥ विरक्तता सीप सुधा रस ले रहै, पीवै न खारा नीर। मांहैं मोती नीपजै, दादू बंद शरीर ॥ 55 ॥ मन दादू मन पंगुल भया, सब गुण गये बिलाइ। है काया नौ-जोबनी, मन बूढ़ा है जाइ ॥ 56 ॥ दादू कच्छप अपने कर लिये, मन इन्द्री निज ठौर। नाम निरंजन लाग रहु, प्राणी परिहर और ॥ 57 ॥ जाचक मन इन्द्री अंधा किया, घट में लहर उठाइ। साँई सतगुरु छोड़ कर, देख दिवाना जाइ ॥ 58 ॥ दादू कहै राम बिना मन रंक है, जाचै तीनों लोक। जब मन लागा राम सौं, तब भागे दालिद्र दोष ॥ 59 ॥ इन्द्री के आधीन मन, जीव जंत सब जाचै। तिणे तिणे के आगे दादू, तिहुं लोक फिर नाचै ॥ 60 ॥ इंद्री अपने वश करै, सो काहे जाचन जाइ। दादू सुस्थिर आत्मा, आसन बैसै आइ ॥ 61 ॥
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