सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10 मन मनसा दोनों मिले, तब जीव किया भांड। पंचों का फेन्या फिरै, माया नचावै रांड ॥ 62 ॥ दादू नकटी आगे नकटा नाचे, नकटी ताल बजावे। नकटी आगे नकटा गावे, नकटी नकटा भावे ॥ 63 ॥ आन लगन व्यभिचार पांचों इंद्री भूत हैं, मनवा क्षेत्रपाल। मनसा देवी पूजिये, दादू तीनों काल ॥ 64 ॥ जीवत लूटै जगत सब, मृतक लूटैं देव। दादू कहाँ पुकारिये, कर कर मूये सेव ॥ 65 ॥ मन अग्नि धूम ज्यों नीकलै, देखत सबै बिलाइ। त्यों मन बिछुटा राम सौं, दह दिश बीखर जाइ ॥ 66 ॥ घर छाड़े जब का गया, मन बहुरि न आया। दादू अग्नि के धूम ज्यों, खुर खोज न पाया ॥ 67 ॥ सब काहू के होत हैं, तन मन पसरैं जाइ। ऐसा कोई एक है, उलटा मांहिं समाइ ॥ 68 ॥ क्यों करि उलटा आनिये, पसर गया मन फेरि। दादू डोरी सहज की, यों आनै घर घेरि ॥ 69 ॥ दादू साधु शब्द सौं मिलि रहै, मन राखै बिलमाइ। साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥ 70 ॥ चंचल चहुँ दिशि जात है, गुरु बाइक सौं बंध। दादू संगति साधु की, पारब्रह्म सौं संध ॥ 71 ॥ एक निरंजन नाम सौं, कै साधु संगति मांहि। दादू मन बिलमाइये, दूजा कोई नांहि ॥ 72 ॥
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