सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10 दादू मन मारे मुनिवर मुये, सुर नर किये संहार। ब्रह्मा विष्णु महेश सब, राखै सिरजनहार ॥ 120 ॥ मन बाहे मुनिवर बड़े, ब्रह्मा विष्णु महेश। सिद्ध साधक योगी यति, दादू देश विदेश ॥ 121 ॥ मनमुखी मान बड़ाई पूजा मान बड़ाइयां, आदर मांगै मन। राम गहै, सब परिहरै, सोई साधु जन ॥ 122 ॥ जहाँ जहाँ आदर पाइये, तहाँ तहाँ जीव जाइ। बिनआदरदीजे राम रस, छाड़ि हलाहल खाइ ॥ 123 ॥ करणी बिना कथनी करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार। दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥ 124 ॥ जाया माया मोहनी दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ। तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥ 125 ॥ मन अब मन निर्भय घर नहीं, भय में बैठा आइ। निर्भय संग थैं बीछुट्या, तब कायर है जाइ ॥ 126 ॥ जब मन मृतक है रहे, इंद्री बल भागा। काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥ 127 ॥ आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहीं धागा। दादू एकै रहि गया, तब जाणी जागा ॥ 128 ॥ दादू मन के शीश मुख, हस्त पांव है जीव। श्रवण नेत्र रसना रटै, दादू पाया पीव ॥ 129 ॥ जहँ के नवाये सब नवैं, सोई सिर कर जाण। जहँ के बुलाये बोलिये, सोई मुख परमाण ॥ 130 ॥
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