सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मन का अंग 10 जहाँ के सुणाये सब सुणैं, सोई श्रवण सयाण । जहाँ के दिखाये देखिये, सोई नैन सुजाण ॥ 131 ॥ दादू मन ही सौं मल ऊपजै, मन ही सौं मल धोइ । सीख चली गुरु साध की, तो तूँ निर्मल होइ ॥ 132 ॥ दादू मन ही माया ऊपजै, मन ही माया जाइ । मन ही राता राम सौं, मन ही रह्या समाइ ॥ 133 ॥ दादू मन ही मरणा ऊपजै, मन ही मरणा खाइ । मन अविनासी ह्वै रह्या, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 134 ॥ मन ही सन्मुख नूर है, मन ही सन्मुख तेज । मन ही सन्मुख ज्योति है, मन ही सन्मुख सेज ॥ 135 ॥ मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ । मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥ 136 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य दसवां मन का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 10 ॥ साखी 136 ॥
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