सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-माया का अंग 12 जैसे मर्कट जीभ रस, आप बंधाणा अंध। ऐसे दादू हम भये, क्यों कर छूटै फंध ॥ 36 ॥ ज्यों सूवा सुख कारणै, बंध्या मूरख माँहि। ऐसे दादू हम भये, क्यों ही निकसै नाहि ॥ 37 ॥ जैसे अंध अज्ञान गृह, बंध्या मूरख स्वाद। ऐसैं दादू हम भये, जन्म गँवाया बाद ॥ 38 ॥ दादू बूड रह्या रे बापुरे, माया गृह के कूप। मोह्या कनक अरु कामिनी, नाना विधि के रूप ॥ 39 ॥ शिश्न स्वाद दादू स्वाद लागि संसार सब, देखत परलै जाइ। इन्द्री स्वारथ साच तजि, सबै बंधाणै आइ ॥ 40 ॥ विष सुख माँहैं रम रहे, माया हित चित लाइ। सोई संतजन ऊबरे, स्वाद छाड़ि गुण गाइ ॥ 41 ॥ आसक्तता मोह दादू झूठी काया झूठ घर, झूठा यहु परिवार। झूठी माया देखकर, फूल्यो कहा गँवार ॥ 42 ॥ दादू झूठा संसार, झूठा परिवार, झूठा घर बार, झूठा नर नार, तहाँ मन माने। झूठा कुल जात, झूठा पितु मात, झूठा बंधु भ्रात, झूठा तन गात, सत्य कर जाने। झूठा सब धंध, झूठा सब फंध, झूठा सब अंध, झूठा जाचंध, कहा मग छाने। दादू भाग, झूठ सब त्याग, जाग रे जाग, देख दीवाने ॥ 43 ॥ दादू झूठे तन के कारणै, कीये बहुत विकार। गृह दारा धन संपदा, पूत कुटुम्ब परिवार ॥ 44 ॥
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