भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहाँ माया तहँ जाइ । विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥ 27 ॥ साधु न कोई पग भरै, कबहुँ राज दुवार । दादू उलटा आप में, बैठा ब्रह्म विचार ॥ 28 ॥ आशय-विश्राम दादू अपणे अपणे घर गये, आपा अंग विचार । सहकामी माया मिले, निहकामी ब्रह्म संभार ॥ 29 ॥ माया दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार । माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥ 30 ॥ शिश्न स्वाद दादू विषय के कारणै रूप राते रहैं, नैन नापाक यों कीन्ह भाई । बदी की बात सुनत सारा दिन, श्रवण नापाक यों कीन्ह जाई ॥ 31 ॥ स्वाद के कारणै लुब्धि लागी रहे, जिभ्या नापाक यों कीन्ह खाई । भोग के कारणै भूख लागी रहे, अंग नापाक यों कीन्ह लाई ॥ 32 ॥ दादू नगरी चैन तब, जब इक राजी होइ । द्वै राजी दुख द्वन्द्व में, सुखी न बैसे कोइ ॥ 33 ॥ इक राजी आनन्द है, नगरी निश्चल वास । राजा प्रजा सुखी बसै, दादू जोति प्रकाश ॥ 34 ॥ शिश्न स्वाद जैसे कुंजर काम वश, आप बंधाणा आइ । ऐसे दादू हम भये, क्यों कर निकस्या जाइ ॥ 35 ॥

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