भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-माया का अंग 12 दादू माया का बल देख कर, आया अति अहंकार। अन्ध भया सूझै नहीं, का करि है सिरजनहार ॥ 16 ॥ विरक्तता मन मनसा माया रती, पंच तत्व प्रकाश। चौदह तीनों लोक सब, दादू होहु उदास ॥ 17 ॥ माया देखे मन खुशी, हिरदै होइ विकास। दादू यहु गति जीव की, अंत न पूगै आस ॥ 18 ॥ मन की मूठि न माँडिये, माया के नीसाण। पीछे ही पछिताहुगे, दादू खूटे बाण ॥ 19 ॥ शिश्न स्वाद कुछ खातां कुछ खेलतां, कुछ सोवत दिन जाइ। कुछ विषिया रस विलसतां, दादू गये विलाइ ॥ 20 ॥ संगति कुसंगति माखन मन पाहण भया, माया रस पीया। पाहण मन माखन भया, राम रस लीया ॥ 21 ॥ दादू माया सौं मन बिगड़या, ज्यों कांजी करि दुग्ध। है कोई संसार में, मन करि देवे शुद्ध ॥ 22 ॥ गंदी सौं गंदा भया, यों गंदा सब कोइ। दादू लागै खूब सौं, तो खूब सरीखा होइ ॥ 23 ॥ दादू माया सौं मन रत भया, विषय रस माता। दादू साचा छाड़ कर, झूठे रंग राता ॥ 24 ॥ माया के संग जे गये, ते बहुरि न आये। दादू माया डाकिनी, इन केते खाये ॥ 25 ॥ दादू माया मोट विकार की, कोइ न सकै डार। बहि बहि मूये बापुरे, गये बहुत पचि हार ॥ 26 ॥

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