भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

श्री दादूवाणी-सांच का अंग 13 साचे का साहिब धणी, समर्थ सिरजनहार । पाखंड की यहु पृथ्विी, प्रपंच का संसार ॥ 150 ॥ कहै दादू जन जो कृत धारै, भलो बुरो फल ताही लारै । झूठा परगट साचा छानै, तिन की दादू राम न मानै ॥ 151 ॥ कहँ आशिक अल्लाह के, मारे अपने हाथ । कहँ आलम औजूद सौं, कहै जुबां की बात ॥ 152 ॥ दादू पाखंड पीव न पाइये, जे अंतर साच न होइ । ऊपर थैं क्यूं ही रहो, भीतर के मल धोइ ॥ 153 ॥ सच अमर जुग जुग रहै, दादू विरला कोइ । झूठ बहुत संसार में, उत्पत्ति परलै होइ ॥ 154 ॥ दादू झूठा बदलिये, साच न बदल्या जाइ । साचा सिर पर राखिये, साध कहै समझाइ ॥ 155 ॥ साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन अंध । दादू मुक्ता छाड़ कर, गल में घाल्या फंद ॥ 156 ॥ साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन नांहि । दादू निर्बंध छाड़ कर, बंध्या द्वै पख माँहि ॥ 157 ॥ एक साच सौं गहगही, जीवन मरण निबाहि । दादू दुखिया राम बिन, भावै तीधर जाहि ॥ 158 ॥ चितावणी दादू छानै छानै कीजिये, चौड़े प्रगट होइ । दादू पैस पयाल में, बुरा करे जनि कोइ ॥ 159 ॥ अनकिया लागै नहीं, किया लागै आइ । साहिब के दर न्याय है, जे कुछ राम रजाइ ॥ 160 ॥ आत्मार्थी भेख सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सतवादी शूर । सोइ मुनिवर दादू बड़े, सन्मुख रहणि हजूर ॥ 161 ॥

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