भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 इन्द्रीयार्थी भेष दादू झूठा राता झूठ सौं, साँचा राता साँच । एता अंध न जानहिं, कहँ कंचन, कहँ काँच ॥ 40 ॥ दादू सच बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 41 ॥ दादू साचा हरि का नाम है, सो ले हिरदै राखि । पाखंड प्रपंच दूर कर, सब साधों की साखि ॥ 42 ॥ आपा निर्दोष हिरदै की हरि लेइगा, अंतरजामी राइ । सच पियारा राम को, कोटिक करि दिखलाइ ॥ 43 ॥ दादू मुख की ना गहै, हिरदै की हरि लेइ । अन्तर सूधा एक सौं, तो बोल्याँ दोष न देइ ॥ 44 ॥ आत्म अर्थी भेष सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन । मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 45 ॥ शब्द सूई सुरति धागा, काया कंथा लाइ । दादू जोगी जुग जुग पहिरै, कबहुँ फाट न जाइ ॥ 46 ॥ ज्ञान गुरु का गूदड़ी, शब्द, गुरु का भेष । अतीत हमारी आत्मा, दादू पंथ अलेख ॥ 47 ॥ इश्क अजब अबदाल है, दर्दवंद दरवेश । दादू सिक्का सब्र है, अक्ल पीर उपदेश ॥ 48 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौदहवां भेष का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 14 ॥ साखी 48 ॥

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