सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 दादू माया कारण मूंड मुंडाया, यहु तौ योग न होई । पारब्रह्म सूं परिचय नांहीं, कपट न सीझै कोई ॥ 28 ॥ पीव न पावै बावरी, रचि रचि करै श्रृंगार । दादू फिर फिर जगत सूं, करैगी व्यभिचार ॥ 29 ॥ प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार । दादू आतम रत नहीं, क्यों मानैं भरतार ॥ 30 ॥ दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार । तहँ न सँवारे आपको, जहाँ भीतर भरतार ॥ 31 ॥ इन्द्रियार्थी भेष सुध बुध जीव धिजाइ कर, माला संकल बाहि । दादू माया ज्ञान सौं, स्वामी बैठा खाइ ॥ 32 ॥ जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख । षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेष ॥ 33 ॥ दादू शेख मुशायख औलिया, पैगम्बर सब पीर । दर्शन सौं परसन नहीं, अजहूँ वैली तीर ॥ 34 ॥ दादू नाना भेष बनाइ कर, आपा देख दिखाइ । दादू दूजा दूर कर, साहिब सौं ल्यो लाइ ॥ 35 ॥ दादू देखा देखी लोक सब, केते आवैं जांहि । राम स्नेही ना मिलैं, जे निज देखैं मांहि ॥ 36 ॥ दादू सब देखैं अस्थूल को, यहु ऐसा आकार । सूक्ष्म सहज न सूझई, निराकार निरधार ॥ 37 ॥ दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 38 ॥ दादू यह परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नाहीं । अन्तर की जानें नहीं, तातैं खोटा खाहिं ॥ 39 ॥
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