सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 दादू माया कारण मूंड मुंडाया, यहु तौ योग न होई । पारब्रह्म सूं परिचय नांहीं, कपट न सीझै कोई ॥ 28 ॥ पीव न पावै बावरी, रचि रचि करै श्रृंगार । दादू फिर फिर जगत सूं, करैगी व्यभिचार ॥ 29 ॥ प्रेम प्रीति सनेह बिन, सब झूठे श्रृंगार । दादू आतम रत नहीं, क्यों मानैं भरतार ॥ 30 ॥ दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार । तहँ न सँवारे आपको, जहाँ भीतर भरतार ॥ 31 ॥ इन्द्रियार्थी भेष सुध बुध जीव धिजाइ कर, माला संकल बाहि । दादू माया ज्ञान सौं, स्वामी बैठा खाइ ॥ 32 ॥ जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख । षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेष ॥ 33 ॥ दादू शेख मुशायख औलिया, पैगम्बर सब पीर । दर्शन सौं परसन नहीं, अजहूँ वैली तीर ॥ 34 ॥ दादू नाना भेष बनाइ कर, आपा देख दिखाइ । दादू दूजा दूर कर, साहिब सौं ल्यो लाइ ॥ 35 ॥ दादू देखा देखी लोक सब, केते आवैं जांहि । राम स्नेही ना मिलैं, जे निज देखैं मांहि ॥ 36 ॥ दादू सब देखैं अस्थूल को, यहु ऐसा आकार । सूक्ष्म सहज न सूझई, निराकार निरधार ॥ 37 ॥ दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 38 ॥ दादू यह परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नाहीं । अन्तर की जानें नहीं, तातैं खोटा खाहिं ॥ 39 ॥
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श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 इन्द्रीयार्थी भेष दादू झूठा राता झूठ सौं, साँचा राता साँच । एता अंध न जानहिं, कहँ कंचन, कहँ काँच ॥ 40 ॥ दादू सच बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ । भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥ 41 ॥ दादू साचा हरि का नाम है, सो ले हिरदै राखि । पाखंड प्रपंच दूर कर, सब साधों की साखि ॥ 42 ॥ आपा निर्दोष हिरदै की हरि लेइगा, अंतरजामी राइ । सच पियारा राम को, कोटिक करि दिखलाइ ॥ 43 ॥ दादू मुख की ना गहै, हिरदै की हरि लेइ । अन्तर सूधा एक सौं, तो बोल्याँ दोष न देइ ॥ 44 ॥ आत्म अर्थी भेष सब चतुराई देखिये, जे कुछ कीजे आन । मन गह राखै एक सौं, दादू साधु सुजान ॥ 45 ॥ शब्द सूई सुरति धागा, काया कंथा लाइ । दादू जोगी जुग जुग पहिरै, कबहुँ फाट न जाइ ॥ 46 ॥ ज्ञान गुरु का गूदड़ी, शब्द, गुरु का भेष । अतीत हमारी आत्मा, दादू पंथ अलेख ॥ 47 ॥ इश्क अजब अबदाल है, दर्दवंद दरवेश । दादू सिक्का सब्र है, अक्ल पीर उपदेश ॥ 48 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चौदहवां भेष का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 14 ॥ साखी 48 ॥
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साधु का अंग www:dadooram.org अथ साधु का अंग १५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ।। 1 ।। साधु महिमा दादू निराकार मन सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं सेव । जे पूजे आकार को, तो साधु प्रत्यक्ष देव ।। 2 ।। दादू भोजन दीजे देह को, लिया मन विश्राम । साधु के मुख मेलिये, पाया आतमराम ।। 3 ।।
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध। दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥ 4 ॥ सत्संग महात्म साधु जन संसार में, भव-जल बोहित अंग। दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥ 5 ॥ साधु जन संसार में, शीतल चंदन वास। दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास ॥ 6 ॥ साधु जन संसार में, हीरे जैसा होय। दादू केते उद्धरे, संगति आये सोय ॥ 7 ॥ साधु जन संसार में, पारस प्रकट गाइ। दादू केते उद्धरे, जेते परसे आइ ॥ 8 ॥ रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ। दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥ 9 ॥ जहाँ अरण्ड अरु आक थे, तहँ चन्दन ऊग्या मांहि। दादू चन्दन कर लिया, आक कहै को नांहि ॥ 10 ॥ साधु नदी जल राम रस, तहाँ पखाले अंग। दादू निर्मल मल गया, साधु जन के संग ॥ 11 ॥ ब्रह्मांड हंड चढ़ाइया, मानौं ऊरे अन। कोई गुरु कृपा तैं ऊबरे, दादू साधू जन ॥ 11क॥ साधु बरसें राम रस, अमृत वाणी आइ। दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥ 12 ॥ साधु संग महिमा महात्म संसार विचारा जात है, बहिया लहर तरंग। भेरे बैठा ऊबरे, सत साधु के संग ॥ 13 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 दादू नेड़ा परम पद, साधु संगति मांहि। दादू सहजैं पाइये, कबहुँ निष्फल नांहि ॥14॥ दादू नेड़ा परम पद, कर साधु का संग। दादू सहजैं पाइये, तन मन लागै रंग ॥15॥ दादू नेड़ा परम पद, साधु संगति होइ। दादू सहजैं पाइये, साबित सन्मुख सोइ ॥16॥ दादू नेड़ा परम पद, साधु जन के साथ। दादू सहजैं पाइये, परम पदार्थ हाथ ॥17॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का भाव। दादू संगति साधु की, जब हरि करै पसाव ॥18॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का हेत। दादू संगति साधु की, कृपा करै तब देत ॥19॥ साधु मिलै तब ऊपजै, प्रेम भक्ति रुचि होइ। दादू संगति साधु की, दया कर देवै सोइ ॥20॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास। दादू संगति साधु की, अविगत पुरवै आस ॥21॥ साधु मिलै तब हरि मिलै, सब सुख आनन्द मूर। दादू संगति साधु की, राम रह्या भरपूर ॥22॥ चौंप चर्चा परम कथा उस एक की, दूजा नांही आन। दादू तन मन लाइ कर, सदा सुरति रस पान ॥23॥ प्रेम कथा हरि की कहै, करै भक्ति लयौ लाइ। पीवै पिलावै राम रस, सो जन मिलियो आइ ॥24॥ दादू पीवै पिलावै राम रस, प्रेम भक्ति गुण गाइ। नित प्रति कथा हरि की करै, हेत सहित लयौ लाइ ॥25॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 आन कथा संसार की, हमहिं सुणावै आइ। तिसका मुख दादू कहै, दई न दिखाइ ताहि ॥ 26 ॥ दादू मुख दिखलाइ साधु का, जे तुमहिं मिलावै आइ। तुम मांही अन्तर करै, दई न दिखाइ ताहि ॥ 27 ॥ जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु। दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥ 28 ॥ साधु सपीड़ा मन करै, सतगुरु शब्द सुनाइ। मीरां मेरा मिहर कर, अन्तर विरह उपाइ ॥ 29 ॥ जिज्ञासु कसौटी ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ। दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥ 30 ॥ सत्संग महिमा साहिब सौं सन्मुख रहै, सत संगति में आइ। दादू साधू सब कहैं, सो निष्फल क्यों जाइ ॥ 31 ॥ ब्रह्म गाय त्रि लोक में, साधु अस्तन पान। मुख मारग अमृत झरै, कत ढूँढै दादू आन ॥ 32 ॥ दादू पाया प्रेम रस, साधु संगति मांहि। फिरि फिरि देखे लोक सब, यहु रस कतहूँ नांहि ॥ 33 ॥ दादू जिस रस को मुनिवर मरैं, सुर नर करैं कलाप। सो रस सहजैं पाइये, साधु संगति आप ॥ 34 ॥ संगति बिन सीझे नहीं, कोटि करे जे कोइ। दादू सतगुरु साधु बिन, कबहुँ शुद्ध न होइ ॥ 35 ॥ दादू नेड़ा दूर तैं, अविगत का आराध। मनसा वाचा कर्मणा, दादू (साधु) संगति साध ॥ 36 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 स्रग न शीतल होइ मन, चन्द न चन्दन पास। शीतल संगति साधु की, कीजे दादू दास ॥ 37 ॥ दादू शीतल जल नहीं, हिम नहिं शीतल होइ। दादू शीतल संत जन, राम सनेही सोइ ॥ 38 ॥ साध बेपरवाही दादू चन्दन कद कह्या, अपना प्रेम प्रकाश। दह दिशि प्रगट है रह्या, शीतल गंध सुवास ॥ 39 ॥ दादू पारस कद कह्या, मुझ थीं कंचन होइ। पारस परगट है रह्या, साच कहै सब कोइ ॥ 40 ॥ नरबिड़ रूप हठीजन तन नहिं भूला, मन नहिं भूला, पंच न भूला प्राण। साधु सबद क्यूँ भूलिये, रे मन मूढ अजाण ॥ 41 ॥ साधु महिमा रत्न पदारथ माणिक मोती, हीरों का दरिया। चिंतामणि चित रामधन, घट अमृत भरिया ॥ 42 ॥ समर्थ शूरा साधु सो, मन मस्तक धरिया। दादू दर्शन देखतां, सब कारज सरिया ॥ 43 ॥ साधु महिमा महात्म धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश। दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥ 44 ॥ चन्द सूर सिजदा करैं, नाम अलह का लेइ। दादू जमीं आस्मान सब, उन पावों सिर देइ ॥ 45 ॥ जे जन राते राम सौं, तिनकी मैं बलि जांव। दादू उन पर वारणे, जे लाग रहे हरि नांव ॥ 46 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 साधु पारिख लक्षण जे जन हरि के रंग रंगे, सो रंग कदे न जाइ। सदा सुरंगे संत जन, रंग में रहे समाइ ॥ 47 ॥ दादू राता राम का, अविनाशी रंग मांहि। सब जग धोबी धो मरै, तो भी खूटै नांहि ॥ 48 ॥ साहिब किया सो क्यों मिटै, सुन्दर शोभा रंग। दादू धोवैं बावरे, दिन दिन होइ सुरंग ॥ 49 ॥ साधु परमार्थी परमारथ को सब किया, आप स्वार्थ नांहि। परमेश्वर परमार्थी, कै साधु कलि मांहि ॥ 50 ॥ पर उपकारी संत सब, आये इहि क लि मांहि। पीवैं पिलावैं राम रस, आप सवारथ नांहि ॥ 51 ॥ पर उपकारी संत जन, साहिब जी तेरे । जाती देखी आतमा, राम कहि टेरे ॥ 52 ॥ चंद सूर पावक पवन, पाणी का मत सार। धरती अंबर रात दिन, तरुवर फलैं अपार ॥ 53 ॥ छाजन भोजन परमार्थी, आतम देव आधार। साधु सेवक राम के, दादू पर उपकार ॥ 54 ॥ साधु साक्षीभूत जिसका तिसको दीजिये, सुकृत पर उपकार। दादू सेवक सो भला, सिर नहिं लेवे भार ॥ 55 ॥ परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार। दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥ 56 ॥ सेवा सुकृत सब गया, मैं मेरा मन मांहि। दादू आपा जब लगै, साहिब मानै नांहि ॥ 57 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 साधु पारिख लक्षण साधु शिरोमणि शोध ले, नदी पूर पर आइ। संजीवनि साम्हा चढै, दूजा बहिया जाइ ॥ 58 ॥ जिनके मस्तक मणि बसै, सो सकल शिरोमणि अंग। जिनके मस्तक मणि नहीं, ते विष भरे भुवंग ॥ 59 ॥ साधु महिमा दादू इस संसार में, ये द्वै रत्न अमोल। इक सांई अरु संतजन, इनका मोल न तोल ॥ 60 ॥ दादू इस संसार में, ये द्वै रहै लुकाइ। राम स्नेही संतजन, और बहुतेरा आइ ॥ 61 ॥ सगे हमारे साधु हैं, सिर पर सिरजनहार। दादू सतगुरु सो सगा, दूजा धंध विकार ॥ 62 ॥ साधु पारख लक्षण जिनके हिरदै हरि बसै, सदा निरंजन नांऊँ। दादू साचे साध की, मैं बलिहारी जांऊँ ॥ 63 ॥ साचा साधु दयालु घट, साहिब का प्यारा। राता माता राम रस, सो प्राण हमारा ॥ 64 ॥ सज्जन दुर्जन दादू फिरता चाक कुम्हार का, यों दीसे संसार। साधुजन निहचल भये, जिनके राम अधार ॥ 65 ॥ सत्संग महिमा जलती बलती आतमा, साधु सरोवर जाइ। दादू पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 66 ॥ कृत्तम कर्त्ता कांजी मांहीं भेल कर, पीवै सब संसार। कर्त्ता केवल निर्मला, को साधु पीवणहार ॥ 67 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 संगति कुसंगति फल दादू असाधु मिलै अन्तर पड़ै, भाव भक्ति रस जाइ। साधु मिलै सुख ऊपजै, आनन्द अंग न माइ ॥ 68 ॥ दादू साधु संगति पाइये, राम अमीफल होइ। संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥ 69 ॥ दादू सभा संत की, सुमति उपजै आइ। शाक्त की सभा बैसतां, ज्ञान काया तैं जाइ ॥ 70 ॥ जग जन विपरीत दादू सब जग दीसै एकला, सेवक स्वामी दोइ। जगत दुहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥ 71 ॥ दादू साधु जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व। दुनी दुखी हम देखतां, साधुन सदा आनन्द ॥ 72 ॥ दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग। यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥ 73 ॥ दादू मीठा पीवै राम रस, सो भी मीठा होइ। सहजैं कड़वा मिट गया, दादू निर्विष सोइ ॥ 74 ॥ साध पारख लक्षण दादू अन्तर एक अनंत सौं, सदा निरंतर प्रीत। जिहिं प्राणी प्रीतम बसै, सो बैठा त्रिभुवन जीत ॥ 75 ॥ साधु महिमा महात्म दादू मैं दासी तिहिं दास की, जिहिं संगि खेलै पीव। बहुत भाँति कर वारणे, तापर दीजे जीव ॥ 76 ॥ भ्रम विध्वंसण दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत। आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥ 77 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 जग जन विपरीत दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध । प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥ 78 ॥ पुरुष प्रकाशिक यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश । दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 79 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ । दादू प्राण पतंग सब, जहँ दीपक तहँ जाइ ॥ 80 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक जलता होइ । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं सब कोइ ॥ 81 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक प्रकट प्रकाश । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस पास ॥ 82 ॥ घर वन मांही राखिये, दीपक ज्योति सहेत । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस हेत ॥ 83 ॥ जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ । नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥ 84 ॥ जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ । उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 85 ॥ साधु अबिहड़ कबहुँ न बिहड़ै सो भला, साधु दिढ मति होइ । दादू हीरा एक रस, बाँध गाँठड़ी सोइ ॥ 86 ॥ साधु पारख लक्षण गरथ न बांधै गांठड़ी, नहीं नारी सौं नेह । मन इंद्री सुस्थिर करै, छाड़ सकल गुण देह ॥ 87 ॥ निराकार सौं मिल रहै, अखंड भक्ति कर लेह । दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥ 88 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 समाचार सत पीव का, कोइ साधु कहेगा आइ । दादू शीतल आत्मा, सुख में रहे समाइ ॥ 89 ॥ साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर । दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥ 90 ॥ साधु लक्षण साधु सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ । दादू पंक परसै नहीं, कर्म न लागै कोइ ॥ 91 ॥ साध सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ । शून्य सरोवर हंसला, दादू विरला कोइ ॥ 92 ॥ साहिब का उनहार सब, सेवक मांही होइ । दादू सेवक साधु को, दूजा नांही कोइ ॥ 93 ॥ दादू जब लग नैन न देखिये, साध कहैं ते अंग । तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥ 94 ॥ दादू सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सकल सिरमौर । जिहिं के हिरदै हरि बसै, दूजा नाहीं और ॥ 95 ॥ दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध । गुण औगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥ 96 ॥ जग जन विपरीत दादू सैन्धव फटिक पाषाण का, ऊपर एकै रंग । पानी मांहीं देखिये, न्यारा न्यारा अंग ॥ 97 ॥ दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसंग । आपा फटिक पाषाण के, मिलै न जल के संग ॥ 98 ॥ दादू सब जग फटिक पाषाण है, साधु सैंधव होइ । सैंधव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥ 99 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 साधु परमार्था को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार। दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥ 100 ॥ दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ। तहाँ राम रस पाइये, जहाँ साधु तहँ जाइ ॥ 101 ॥ चौंप चरचा दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि। तिस आगे हरि गुण कथूं, सुणत न करई काणि ॥ 102 ॥ साधु परमार्था दादू सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाण। दादू छांटा अमी का, को साधु बाहे आण ॥ 103 ॥ सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ। दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥ 104 ॥ सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ। दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥ 105 ॥ सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव। साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥ 106 ॥ हरि जल बरसै बाहिरा, सूखे काया खेत। दादू हरिया होइगा, सींचणहार सुचेत ॥ 107 ॥ कुसंगति गंगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर मांहि। खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नांहि ॥ 108 ॥ दादू राम न छाड़िये, गहिला तज संसार। साधु संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥ 109 ॥ दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ। सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥ 110 ॥
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 अज्ञान मूर्खः हितकारी, सज्जनो हि समो रिपुः । ज्ञात्वा(परि)त्यजंति ते, निरामयी मनोजितः ।। 111 ।। कुसंगति केते गये, तिनका नांव न ठांव । दादू ते क्यों उब्बरैं, साधु नहीं जिस गाँव ।। 112 ।। भाव भक्ति का भंग कर, बटपारे मारहिं बाट। दादू द्वारा मुक्ति का, खोले जड़े कपाट ।। 113 ।। सत्संग महिमा महात्म साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर । प्रेम भक्ति भावै नहीं, यहु मन का मत और ।। 114 ।। दादू राम मिलन के कारणे, जे तूँ खरा उदास । साधु संगति शोध ले, राम उन्हीं के पास ।। 115 ।। पुरुष प्रकाशिक संत महिमा ब्रह्मा शंकर सेष मुनि, नारद ध्रुव शुकदेव । सकल साधु दादू सही, जे लागे हरि सेव ।। 116 ।। साधु कंवल हरि वासना, संत भ्रमर संग आइ । दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ।। 117 ।। साधु सज्जन दादू सहजैं मेला होइगा, हम तुम हरि के दास । अंतरगति तो मिलि रहे, पुनि प्रकट प्रकाश ।। 118 ।। दादू मम सिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया । कहा करै जम काल, राम रसायन भर पिया ।। 119 ।। साधु समर्थता दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार । चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ।। 120 ।। विष का अमृत कर लिया, पावक का पाणी । बाँका सूधा करि लिया, सो साध बिनाणी ।। 121 ।।
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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 दादू ऊरा पूरा कर लिया, खारा मीठा होइ । फूटा सारा कर लिया, साधु विवेकी सोइ ॥ 122 ॥ बंध्या मुक्ता कर लिया, उरझ्या सुरझ समान । बैरी मिंता कर लिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥ 123 ॥ झूठा साचा कर लिया, काँचा कंचन सार । मैला निर्मल कर लिया, दादू ज्ञान विचार ॥ 124 ॥ अमिट पाप प्रचंड दादू काया कर्म लगाइ कर, तीर्थ धोवै आइ । तीर्थ मांही कीजिए, सो कैसे कर जाइ ॥ 125 ॥ जहँ तिरिये तहँ डूबिये, मन में मैला होइ । जहाँ छूटे तहँ बंधिये, कपट न सीझे कोइ ॥ 126 ॥ सत्संग महिमा दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध । दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥ 127 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुबुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पन्द्रहवां साधु काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 15 ॥ साखी 127 ॥
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मध्य का अंग www.dadooram.org अथ मध्य का अंग १६ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ मध्य निष्पक्ष दादू द्वै पख रहिता सहज सो, सुख दुख एक समान। मरै न जीवै सहज सो, पूरा पद निर्वाण ॥ 2 ॥ सहज रूप मन का भया, जब द्वै द्वै मिटी तरंग। ताता शीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 3 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 सुख दुख मन मानै नहीं, राम रंग राता। दादू दोनों छाड़ि सब, प्रेम रस माता ॥ 4 ॥ मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान। दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥ 5 ॥ कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ। दादू निरपख है रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 6 ॥ सुख दुख मन मानै नहीं, आपा पर सम भाइ। सो मन ! मन कर सेविये, सब पूरण ल्यौ लाइ ॥ 7 ॥ ना हम छाडैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार। मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥ 8 ॥ सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि। लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 9 ॥ आपा मेटै मृत्तिका, आपा धरै आकास। दादू जहाँ जहाँ द्वै नहीं, मध्य निरंतर वास ॥ 10 ॥ ध्येय परम स्थान निरूपण नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ। नहिं सूता नहि जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 11 ॥ दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्ष्म लोक। तातैं आगे और है, तहँ वहाँ हर्ष न शोक ॥ 12 ॥ दादू हद छाड़ बेहद में, निर्भय निर्पख होइ। लाग रहै उस एक सौं, जहाँ न दूजा कोइ ॥ 13 ॥ दादू दूजे अन्तर होत है, जनि आणै मन मांहि। तहँ ले मन को राखिये, जहाँ कुछ दूजा नांहि ॥ 14 ॥ निराधार घर कीजिये, जहाँ नांहि धरणि आकास। दादू निश्चल मन रहै, निर्गुण के विश्वास ॥ 15 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि । दादू पंचों पूरि ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 16 ॥ अधर चाल कबीर की, आसंघी नहिं जाइ । दादू डाकै मृग ज्यों, उलट पड़े भुवि आइ ॥ 17 ॥ दादू रहणी कबीर की, कठिन विषम यहु चाल । अधर एक सौं मिल रह्या, जहाँ न झंपै काल ॥ 18 ॥ निराधार निज भक्ति कर, निराधार निज सार । निराधार निज नाम ले, निराधार निराकार ॥ 19 ॥ निराधार निज राम रस, को साधु पीवनहार । निराधार निर्मल रहै, दादू ज्ञान विचार ॥ 20 ॥ जब निराधार मन रह गया, आत्म के आनन्द । दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥ 21 ॥ माया दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि । जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥ 22 ॥ मध्य निरपेक्ष चलु दादू तहँ जाइये, जहँ मरै न जीवै कोइ । आवागमन भय को नहीं, सदा एक रस होइ ॥ 23 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, जहँ चंद सूर नहिं जाइ । रात दिवस की गम नहीं, सहजैं रह्या समाइ ॥ 24 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, माया मोह तैं दूर । सुख दुख को व्यापै नहीं, अविनासी घर पूर ॥ 25 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, जहँ जम जोरा को नांहि । काल मीच लागै नहीं, मिल रहिये ता मांहि ॥ 26 ॥
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श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 एक देश हम देखिया, जहाँ ऋतु नहीं पलटै कोइ । हम दादू उस देश के, जहाँ सदा एक रस होइ ॥ 27 ॥ एक देश हम देखिया, जहाँ बस्ती ऊजड़ नाहिं । हम दादू उस देश के, सहज रूप ता मांहि ॥ 28 ॥ एक देश हम देखिया, नहिं नेड़े नहिं दूर । हम दादू उस देश के, रहे निरंतर पूर ॥ 29 ॥ एक देश हम देखिया, जहाँ निशदिन नाहीं घाम । हम दादू उस देश के, जहाँ निकट निरंजन राम ॥ 30 ॥ बारहमासी नीपजै, तहाँ किया परवेश । दादू सूखा ना पड़े, हम आये उस देश ॥ 31 ॥ जहाँ वेद कुरान की गम नहीं, तहाँ किया परवेश । तहँ कछु अचरज देखिया, यहु कुछ औरै देश ॥ 32 ॥ भ्रम विध्वंस ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया क्लेश । दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥ 33 ॥ काहे दादू घर रहै, काहे वन-खंड जाइ । घर वन रहिता राम है, ताही सौं ल्यौ लाइ ॥ 34 ॥ दादू जिन प्राणी कर जानिया, घर वन एक समान । घर मांही वन ज्यों रहै, सोई साधु सुजान ॥ 35 ॥ सब जग मांही एकला, देह निरंतर वास । दादू कारण राम के, घर वन मांहि उदास ॥ 36 ॥ घर वन मांही सुख नहीं, सुख है सांई पास । दादू तासौं मन मिल्या, इनतैं भया उदास ॥ 37 ॥ ना घर भला न वन भला, जहाँ नहीं निज नांव । दादू उनमन मन रहै, भला तो सोई ठांव ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी–मध्य का अंग 16 बैरागी वन में बसै, घरबारी घर मांहि। राम निराला रह गया, दादू इनमें नांहि ॥ 39 ॥ दीन दुनी सदिकै करूं, टुक देखण दे दीदार। तन मन भी छिन छिन करूं, भिश्त दोजग भी वार ॥ 40 ॥ दादू जीवन मरण का, मुझ पछतावा नांहि। मुझ पछतावा पीव का, रह्या न नैनहुँ मांहि ॥ 41 ॥ स्वर्ग नरक संशय नहीं, जीवन मरण भय नांहि। राम विमुख जे दिन गये, सो सालैं मन मांहि ॥ 42 ॥ स्वर्ग नरक सुख दुख तजे, जीवन मरण नशाइ। दादू लोभी राम का, को आवै को जाइ ॥ 43 ॥ मध्य निष्पक्ष दादू हिन्दू तुरक न होइबा, साहिब सेती काम। षट् दर्शन के संग न जाइबा, निर्पख कहबा राम ॥ 44 ॥ षट् दर्शन दोन्यों नहीं, निरालंब निज बाट। दादू एकै आसरे, लंघे औघट घाट ॥ 45 ॥ दादू ना हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मुसलमान। षट् दर्शन में हम नहीं, हम राते रहमान ॥ 46 ॥ जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख। षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेख ॥ 47 ॥ दादू अल्लाह राम का, द्वै पख तैं न्यारा। रहिता गुण आकार का, सो गुरु हमारा ॥ 48 ॥ उभय असमाव दादू मेरा तेरा बावरे, मैं तैं की तज बान। जिन यहु सब कुछ सिरजिया, करता ही का जान ॥ 49 ॥
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