भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 आन कथा संसार की, हमहिं सुणावै आइ। तिसका मुख दादू कहै, दई न दिखाइ ताहि ॥ 26 ॥ दादू मुख दिखलाइ साधु का, जे तुमहिं मिलावै आइ। तुम मांही अन्तर करै, दई न दिखाइ ताहि ॥ 27 ॥ जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु। दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥ 28 ॥ साधु सपीड़ा मन करै, सतगुरु शब्द सुनाइ। मीरां मेरा मिहर कर, अन्तर विरह उपाइ ॥ 29 ॥ जिज्ञासु कसौटी ज्यों ज्यों होवै त्यों कहै, घट बध कहै न जाइ। दादू सो सुध आत्मा, साधू परसै आइ ॥ 30 ॥ सत्संग महिमा साहिब सौं सन्मुख रहै, सत संगति में आइ। दादू साधू सब कहैं, सो निष्फल क्यों जाइ ॥ 31 ॥ ब्रह्म गाय त्रि लोक में, साधु अस्तन पान। मुख मारग अमृत झरै, कत ढूँढै दादू आन ॥ 32 ॥ दादू पाया प्रेम रस, साधु संगति मांहि। फिरि फिरि देखे लोक सब, यहु रस कतहूँ नांहि ॥ 33 ॥ दादू जिस रस को मुनिवर मरैं, सुर नर करैं कलाप। सो रस सहजैं पाइये, साधु संगति आप ॥ 34 ॥ संगति बिन सीझे नहीं, कोटि करे जे कोइ। दादू सतगुरु साधु बिन, कबहुँ शुद्ध न होइ ॥ 35 ॥ दादू नेड़ा दूर तैं, अविगत का आराध। मनसा वाचा कर्मणा, दादू (साधु) संगति साध ॥ 36 ॥

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