सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 दादू नेड़ा परम पद, साधु संगति मांहि। दादू सहजैं पाइये, कबहुँ निष्फल नांहि ॥14॥ दादू नेड़ा परम पद, कर साधु का संग। दादू सहजैं पाइये, तन मन लागै रंग ॥15॥ दादू नेड़ा परम पद, साधु संगति होइ। दादू सहजैं पाइये, साबित सन्मुख सोइ ॥16॥ दादू नेड़ा परम पद, साधु जन के साथ। दादू सहजैं पाइये, परम पदार्थ हाथ ॥17॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का भाव। दादू संगति साधु की, जब हरि करै पसाव ॥18॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि का हेत। दादू संगति साधु की, कृपा करै तब देत ॥19॥ साधु मिलै तब ऊपजै, प्रेम भक्ति रुचि होइ। दादू संगति साधु की, दया कर देवै सोइ ॥20॥ साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास। दादू संगति साधु की, अविगत पुरवै आस ॥21॥ साधु मिलै तब हरि मिलै, सब सुख आनन्द मूर। दादू संगति साधु की, राम रह्या भरपूर ॥22॥ चौंप चर्चा परम कथा उस एक की, दूजा नांही आन। दादू तन मन लाइ कर, सदा सुरति रस पान ॥23॥ प्रेम कथा हरि की कहै, करै भक्ति लयौ लाइ। पीवै पिलावै राम रस, सो जन मिलियो आइ ॥24॥ दादू पीवै पिलावै राम रस, प्रेम भक्ति गुण गाइ। नित प्रति कथा हरि की करै, हेत सहित लयौ लाइ ॥25॥
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