भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 ज्यों यहु काया जीव की, त्यों सांई के साध। दादू सब संतोषिये, मांहि आप अगाध ॥ 4 ॥ सत्संग महात्म साधु जन संसार में, भव-जल बोहित अंग। दादू केते उद्धरे, जेते बैठे संग ॥ 5 ॥ साधु जन संसार में, शीतल चंदन वास। दादू केते उद्धरे, जे आये उन पास ॥ 6 ॥ साधु जन संसार में, हीरे जैसा होय। दादू केते उद्धरे, संगति आये सोय ॥ 7 ॥ साधु जन संसार में, पारस प्रकट गाइ। दादू केते उद्धरे, जेते परसे आइ ॥ 8 ॥ रूख वृक्ष वनराइ सब, चंदन पासैं होइ। दादू बास लगाइ कर, किये सुगन्धे सोइ ॥ 9 ॥ जहाँ अरण्ड अरु आक थे, तहँ चन्दन ऊग्या मांहि। दादू चन्दन कर लिया, आक कहै को नांहि ॥ 10 ॥ साधु नदी जल राम रस, तहाँ पखाले अंग। दादू निर्मल मल गया, साधु जन के संग ॥ 11 ॥ ब्रह्मांड हंड चढ़ाइया, मानौं ऊरे अन। कोई गुरु कृपा तैं ऊबरे, दादू साधू जन ॥ 11क॥ साधु बरसें राम रस, अमृत वाणी आइ। दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥ 12 ॥ साधु संग महिमा महात्म संसार विचारा जात है, बहिया लहर तरंग। भेरे बैठा ऊबरे, सत साधु के संग ॥ 13 ॥

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