सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि । दादू पंचों पूरि ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 16 ॥ अधर चाल कबीर की, आसंघी नहिं जाइ । दादू डाकै मृग ज्यों, उलट पड़े भुवि आइ ॥ 17 ॥ दादू रहणी कबीर की, कठिन विषम यहु चाल । अधर एक सौं मिल रह्या, जहाँ न झंपै काल ॥ 18 ॥ निराधार निज भक्ति कर, निराधार निज सार । निराधार निज नाम ले, निराधार निराकार ॥ 19 ॥ निराधार निज राम रस, को साधु पीवनहार । निराधार निर्मल रहै, दादू ज्ञान विचार ॥ 20 ॥ जब निराधार मन रह गया, आत्म के आनन्द । दादू पीवे रामरस, भेटे परमानन्द ॥ 21 ॥ माया दुहुँ बिच राम अकेला आपै, आवण जाण न देहि । जहँ के तहँ सब राखै दादू, पार पहुँचे तेहि ॥ 22 ॥ मध्य निरपेक्ष चलु दादू तहँ जाइये, जहँ मरै न जीवै कोइ । आवागमन भय को नहीं, सदा एक रस होइ ॥ 23 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, जहँ चंद सूर नहिं जाइ । रात दिवस की गम नहीं, सहजैं रह्या समाइ ॥ 24 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, माया मोह तैं दूर । सुख दुख को व्यापै नहीं, अविनासी घर पूर ॥ 25 ॥ चलु दादू तहँ जाइये, जहँ जम जोरा को नांहि । काल मीच लागै नहीं, मिल रहिये ता मांहि ॥ 26 ॥
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