भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 504 में से

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पृष्ठ 198

श्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 सुख दुख मन मानै नहीं, राम रंग राता। दादू दोनों छाड़ि सब, प्रेम रस माता ॥ 4 ॥ मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान। दादू आपा मेट कर, सेवा करै सुजान ॥ 5 ॥ कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ। दादू निरपख है रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 6 ॥ सुख दुख मन मानै नहीं, आपा पर सम भाइ। सो मन ! मन कर सेविये, सब पूरण ल्यौ लाइ ॥ 7 ॥ ना हम छाडैं ना गहैं, ऐसा ज्ञान विचार। मध्य भाव सेवैं सदा, दादू मुक्ति द्वार ॥ 8 ॥ सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि। लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 9 ॥ आपा मेटै मृत्तिका, आपा धरै आकास। दादू जहाँ जहाँ द्वै नहीं, मध्य निरंतर वास ॥ 10 ॥ ध्येय परम स्थान निरूपण नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ। नहिं सूता नहि जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 11 ॥ दादू इस आकार तैं, दूजा सूक्ष्म लोक। तातैं आगे और है, तहँ वहाँ हर्ष न शोक ॥ 12 ॥ दादू हद छाड़ बेहद में, निर्भय निर्पख होइ। लाग रहै उस एक सौं, जहाँ न दूजा कोइ ॥ 13 ॥ दादू दूजे अन्तर होत है, जनि आणै मन मांहि। तहँ ले मन को राखिये, जहाँ कुछ दूजा नांहि ॥ 14 ॥ निराधार घर कीजिये, जहाँ नांहि धरणि आकास। दादू निश्चल मन रहै, निर्गुण के विश्वास ॥ 15 ॥

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