भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 साधु परमार्था को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार। दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥ 100 ॥ दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ। तहाँ राम रस पाइये, जहाँ साधु तहँ जाइ ॥ 101 ॥ चौंप चरचा दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि। तिस आगे हरि गुण कथूं, सुणत न करई काणि ॥ 102 ॥ साधु परमार्था दादू सब ही मृतक समान हैं, जीया तब ही जाण। दादू छांटा अमी का, को साधु बाहे आण ॥ 103 ॥ सबही मृतक ह्वै रहे, जीवैं कौन उपाइ। दादू अमृत रामरस, को साधू सींचे आइ ॥ 104 ॥ सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ। दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥ 105 ॥ सब ही मृतक देखिये, किहिं विधि जीवैं जीव। साधु सुधारस आणि करि, दादू बरसे पीव ॥ 106 ॥ हरि जल बरसै बाहिरा, सूखे काया खेत। दादू हरिया होइगा, सींचणहार सुचेत ॥ 107 ॥ कुसंगति गंगा यमुना सरस्वती, मिलैं जब सागर मांहि। खारा पानी ह्वै गया, दादू मीठा नांहि ॥ 108 ॥ दादू राम न छाड़िये, गहिला तज संसार। साधु संगति शोध ले, कुसंगति संग निवार ॥ 109 ॥ दादू कुसंगति सब परिहरै, मात पिता कुल कोइ। सजन स्नेही बांधवा, भावै आपा होइ ॥ 110 ॥

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