भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 193

श्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 समाचार सत पीव का, कोइ साधु कहेगा आइ । दादू शीतल आत्मा, सुख में रहे समाइ ॥ 89 ॥ साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर । दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥ 90 ॥ साधु लक्षण साधु सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ । दादू पंक परसै नहीं, कर्म न लागै कोइ ॥ 91 ॥ साध सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ । शून्य सरोवर हंसला, दादू विरला कोइ ॥ 92 ॥ साहिब का उनहार सब, सेवक मांही होइ । दादू सेवक साधु को, दूजा नांही कोइ ॥ 93 ॥ दादू जब लग नैन न देखिये, साध कहैं ते अंग । तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥ 94 ॥ दादू सोइ जन साधु सिद्ध सो, सोइ सकल सिरमौर । जिहिं के हिरदै हरि बसै, दूजा नाहीं और ॥ 95 ॥ दादू अवगुण छाड़ै गुण गहै, सोई शिरोमणि साध । गुण औगुण तैं रहित है, सो निज ब्रह्म अगाध ॥ 96 ॥ जग जन विपरीत दादू सैन्धव फटिक पाषाण का, ऊपर एकै रंग । पानी मांहीं देखिये, न्यारा न्यारा अंग ॥ 97 ॥ दादू सैंधव के आपा नहीं, नीर खीर परसंग । आपा फटिक पाषाण के, मिलै न जल के संग ॥ 98 ॥ दादू सब जग फटिक पाषाण है, साधु सैंधव होइ । सैंधव एकै ह्वै रह्या, पानी पत्थर दोइ ॥ 99 ॥

  • 193 -
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक) · पृष्ठ 193, कुल 504 में से · BharatKosha