सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-साधु का अंग 15 जग जन विपरीत दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध । प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥ 78 ॥ पुरुष प्रकाशिक यहु घट दीपक साध का, ब्रह्म ज्योति प्रकाश । दादू पंखी संतजन, तहाँ परैं निज दास ॥ 79 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक ज्योति जगाइ । दादू प्राण पतंग सब, जहँ दीपक तहँ जाइ ॥ 80 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक जलता होइ । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं सब कोइ ॥ 81 ॥ घर वन मांहीं राखिये, दीपक प्रकट प्रकाश । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस पास ॥ 82 ॥ घर वन मांही राखिये, दीपक ज्योति सहेत । दादू प्राण पतंग सब, आइ मिलैं उस हेत ॥ 83 ॥ जिहिं घट प्रकट राम है, सो घट तज्या न जाइ । नैनहुँ मांही राखिये, दादू आप नशाइ ॥ 84 ॥ जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ । उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 85 ॥ साधु अबिहड़ कबहुँ न बिहड़ै सो भला, साधु दिढ मति होइ । दादू हीरा एक रस, बाँध गाँठड़ी सोइ ॥ 86 ॥ साधु पारख लक्षण गरथ न बांधै गांठड़ी, नहीं नारी सौं नेह । मन इंद्री सुस्थिर करै, छाड़ सकल गुण देह ॥ 87 ॥ निराकार सौं मिल रहै, अखंड भक्ति कर लेह । दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥ 88 ॥
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