सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी–मध्य का अंग 16 बैरागी वन में बसै, घरबारी घर मांहि। राम निराला रह गया, दादू इनमें नांहि ॥ 39 ॥ दीन दुनी सदिकै करूं, टुक देखण दे दीदार। तन मन भी छिन छिन करूं, भिश्त दोजग भी वार ॥ 40 ॥ दादू जीवन मरण का, मुझ पछतावा नांहि। मुझ पछतावा पीव का, रह्या न नैनहुँ मांहि ॥ 41 ॥ स्वर्ग नरक संशय नहीं, जीवन मरण भय नांहि। राम विमुख जे दिन गये, सो सालैं मन मांहि ॥ 42 ॥ स्वर्ग नरक सुख दुख तजे, जीवन मरण नशाइ। दादू लोभी राम का, को आवै को जाइ ॥ 43 ॥ मध्य निष्पक्ष दादू हिन्दू तुरक न होइबा, साहिब सेती काम। षट् दर्शन के संग न जाइबा, निर्पख कहबा राम ॥ 44 ॥ षट् दर्शन दोन्यों नहीं, निरालंब निज बाट। दादू एकै आसरे, लंघे औघट घाट ॥ 45 ॥ दादू ना हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मुसलमान। षट् दर्शन में हम नहीं, हम राते रहमान ॥ 46 ॥ जोगी जंगम सेवड़े, बौद्ध सन्यासी शेख। षट् दर्शन दादू राम बिन, सबै कपट के भेख ॥ 47 ॥ दादू अल्लाह राम का, द्वै पख तैं न्यारा। रहिता गुण आकार का, सो गुरु हमारा ॥ 48 ॥ उभय असमाव दादू मेरा तेरा बावरे, मैं तैं की तज बान। जिन यहु सब कुछ सिरजिया, करता ही का जान ॥ 49 ॥
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