सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 दादू करणी हिन्दू तुरक की, अपनी अपनी ठौर । दुहुं बिच मारग साधु का, यहु संतों की रह और ॥ 50 ॥ दादू हिन्दू तुरक का, द्वै पख पंथ निवार । संगति साचे साधु की, सांई को संभार ॥ 51 ॥ दादू हिन्दू लागे देहुरे, मुसलमान मसीति । हम लागे एक अलेख सौं, सदा निरंतर प्रीति ॥ 52 ॥ न तहाँ हिन्दू देवरा, न तहाँ तुरक मसीति । दादू आपै आप है, नहीं तहाँ रह रीति ॥ 53 ॥ यहु मसीत यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाइ । भीतर सेवा बन्दगी, बाहिर काहे जाइ ॥ 54 ॥ दोनों हाथी ह्वै रहे, मिल रस पिया न जाइ । दादू आपा मेट कर, दोनों रहें समाइ ॥ 55 ॥ भयभीत भयानक ह्वै रहे, देख्या निर्पख अंग । दादू एकै ले रह्या, दूजा चढै न रंग ॥ 56 ॥ जानै बूझै साच है, सबको देखन धाइ । चाल नहीं संसार की, दादू गह्या न जाइ ॥ 57 ॥ दादू पख काहू के ना मिले, निर्पख निर्मल नांव । सांई सौं सन्मुख सदा, मुक्ता सब ही ठांव ॥ 58 ॥ दादू जब तैं हम निर्पख भये, सबै रिसाने लोक। सतगुरु के परसाद तैं, मेरे हर्ष न शोक ॥ 59 ॥ निर्पख ह्वै कर पख गहै, नरक पड़ैगा सोइ । हम निर्पख लागे नाम सौं, कर्त्ता करै सो होइ ॥ 60 ॥ हरि भरोसा दादू पख काहू के ना मिलैं, निष्कामी निर्पख साध । एक भरोसे राम के, खेलैं खेल अगाध ॥ 61 ॥
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