सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-मध्य का अंग 16 मध्य दादू पखा पखी संसार सब, निर्पख विरला कोइ । सोई निर्पख होइगा, जाके नाम निरंजन होइ ॥ 62 ॥ अपने अपने पंथ की, सब को कहै बढाइ । तातैं दादू एक सौं, अन्तरगति ल्यौ लाइ ॥ 63 ॥ दादू द्वै पख दूर कर, निर्पख निर्मल नांव । आपा मेटै हरि भजै, ताकी मैं बलि जांव ॥ 64 ॥ संजीवन दादू तज संसार सब, रहै निराला होइ । अविनाशी के आसरे, काल न लागै कोइ ॥ 65 ॥ मत्सर ईर्ष्या कलियुग कूकर कलमुँहा, उठ-उठ लागै धाइ । दादू क्यों करि छूटिये, कलियुग बड़ी बलाइ ॥ 66 ॥ संसार का त्याग काला मुँह संसार का, नीले कीये पाँव । दादू तीन तलाक दे, भावै तीधर जाव ॥ 67 ॥ दादू भावहीन जे पृथ्वी, दया विहूणा देश । भक्ति नहीं भगवंत की, तहँ कैसा प्रवेश ॥ 68 ॥ जे बोलैं तो चुप कहैं, चुप तो कहैं पुकार । दादू क्यों कर छूटिये, ऐसा है संसार ॥ 69 ॥ न जाणूं, हाँजी, चुप गहि, मेट अग्नि की झाल । सदा सजीवन सुमिरिये, दादू बंचै काल ॥ 70 ॥ पंथ चलैं ते प्राणिया, तेता कुल व्यवहार । निर्पख साधु सो सही, जिनके एक अधार ॥ 71 ॥ दादू पंथों पड़ गये, बपुरे बारह बाट । इनके संग न जाइये, उलटा अविगत घाट ॥ 72 ॥
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