भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 दादू स्वांगी सब संसार है, साधू विरला कोइ । जैसे चन्दन बावना, वन वन कहीं न होइ ॥ 16 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधू कोई एक । हीरा दूर दिशन्तरा, कंकर और अनेक ॥ 17 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधू सोध सुजाण । पारस परदेशों भया, दादू बहुत पषाण ॥ 18 ॥ दादू स्वांगी सब संसार है, साधु समन्दां पार । अनल पंखी कहँ पाइये, पंखी कोटि हजार ॥ 19 ॥ दादू चन्दन वन नहीं, शूरन के दल नांहि । सकल समन्द हीरा नहीं, त्यों साधू जग मांहि ॥ 20 ॥ जे सांई का ह्रै रहै, सांई तिसका होइ । दादू दूजी बात सब, भेष न पावै कोइ ॥ 21 ॥ दादू स्वांग सगाई कुछ नहीं, राम सगाई साच । साधू नाता नाम का, दूजै अंग न राच ॥ 22 ॥ दादू एकै आत्मा, साहिब है सब मांहि । साहिब के नाते मिले, भेष पंथ के नांहि ॥ 23 ॥ दादू माला तिलक सौं कुछ नहीं, काहू सेती काम । अन्तर मेरे एक है, अहर्निशि उसका नाम ॥ 24 ॥ अमिट पाप प्रचण्ड भक्त भेख धरि मिथ्या बोलै, निंदा पर अपवाद । साचे को झूठा कहै, लागै बहु अपराध ॥ 25 ॥ दादू कब हूँ कोई जनि मिलै, भक्त भेष सौं जाइ । जीव जन्म का नाश है, कहैं अमृत, विष खाइ ॥ 26 ॥ चित्त कपटी दादू पहुँचे पूत बटाऊ होइ कर, नट ज्यों काछा भेख । खबर न पाई खोज की, हमको मिल्या अलेख ॥ 27 ॥

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