भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180

श्री दादूवाणी-भेष का अंग 14 ज्ञानी पंडित बहुत हैं, दाता शूर अनेक। दादू भेष अनन्त हैं, लाग रह्या सो एक॥ 4 ॥ आत्मार्थी इंद्रियार्थी भेष कोरा कलश अवाह का, ऊपरि चित्र अनेक। क्या कीजे दादू वस्तु बिन, ऐसे नाना भेष ॥ 5 ॥ बाहर दादू भेष बिन, भीतर वस्तु अगाध। सो ले हिरदै राखिये, दादू सन्मुख साध ॥ 6 ॥ दादू भांडा भर धर वस्तु सौं, ज्यों महँगे मोल बिकाइ। खाली भांडा वस्तु बिन, कौड़ी बदले जाइ ॥ 7 ॥ दादू कनक कलश विष सौं भऱ्या, सो आवै किस काम। सो धन कूटा चाम का, जामें अमृत राम ॥ 8 ॥ दादू देखे वस्तु को, बासन देखे नांहि। दादू भीतर भर धऱ्या, सो मेरे मन मांहि ॥ 9 ॥ दादू जे तूं समझै तो कहूँ, सांचा एक अलेख। डाल पान तज मूल गह, क्या दिखलावै भेख ॥ 10 ॥ दादू सब दिखलावैं आपको, नाना भेष बनाइ। जहाँ आपा मेटन, हरि भजन, तिहिं दिशि कोइ न जाइ ॥ 11 ॥ सो दशा कतहूँ रही, जिहिं दिश पहुँचे साध। मैं तैं मूरख गहि रहे, लोभ बड़ाई वाद ॥ 12 ॥ दादू भेष बहुत संसार में, हरिजन विरला कोइ। हरिजन राता राम सौं, दादू ऐकै होइ ॥ 13 ॥ हीरे रीझै जौहरी, खल रीझै संसार। स्वाँगी साधु बहु अन्तरा, दादू सत्य विचार ॥ 14 ॥ स्वांगी साधु बहु अन्तरा, जेता धरणी आकाश। साधु राता राम सौं, स्वांगी जगत की आश ॥ 15 ॥

  • 180 -