भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-पीव पहिचान का अंग 20 राम रटण छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ । बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 29 ॥ उरैं ही अटकै नहीं, जहाँ राम तहँ जाइ । दादू पावै परम सुख, विलसै वस्तु अघाइ ॥ 30 ॥ दादू उरैं ही उरझे घणे, मूये गल दे पास । ऐन अंग जहाँ आप था, तहाँ गये निज दास ॥ 31 ॥ सेवा का सुख प्रेम रस, सेज सुहाग न देइ । दादू बाहे दास को, कहै दूजा सब लेइ ॥ 32 ॥ सुन्दरी विलाप पर पुरषा सब परिहरे, सुन्दरि देखे जाग । अपना पीव पिछाण कर, दादू रहिये लाग ॥ 33 ॥ आन पुरुष हूँ बहिनड़ी, परम पुरुष भर्तार । हौं अबला समझूं नहीं, तूं जाणै कर्तार ॥ 34 ॥ लोहा माटी मिलि रह्या, दिन दिन काई खाइ । दादू पारस राम बिन, कतहूँ गया विलाइ ॥ 35 ॥ लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग । दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥ 36 ॥ दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह । लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥ 37 ॥ विचार परचै जिज्ञासु उपदेश दहदिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन । राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 38 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत- सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश- ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य बीसवां पीव पहिचान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 20 ॥ साखी 38 ॥

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