सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ। सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 37 ॥ है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ। हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥ 38 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ। निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥ 39 ॥ नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ। दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥ 40 ॥ दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ। लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥ 41 ॥ देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि। सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 42 ॥ कस्तूत कर्म दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ। जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥ 43 ॥ कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार। करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥ 44 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य इक्कीसवां समर्थता काअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 21 ॥ साखी 44 ॥
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