भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-समर्थता का अंग 21 ईश्वर समर्थता ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी। जेती बाबा तैं कही, इन इक न मानी ॥ 26 ॥ दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ। समर्थ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥ 27 ॥ दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ। ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥ 28 ॥ समर्थ साक्षीभूत समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ। घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥ 29 ॥ रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ। आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥ 30 ॥ कर्त्ता साक्षीभूत श्रम नहीं सब कुछ करै, यौं कल धरी बनाइ। कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥ 31 ॥ लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापै कोइ। दादू निश्चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥ 32 ॥ बिन गुण व्यापै सब किया, समर्थ आपै आप। निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥ 33 ॥ ईश्वर समर्थाई समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि। सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥ 34 ॥ पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ। हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥ 35 ॥ यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार। पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥ 36 ॥

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