सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-जीवित मृतकका अंग 23 दीनता-गरीबी दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार । गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥ 5 ॥ मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान । सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥ 6 ॥ झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान । दादू दीन गरीब है, पाया पद निर्वाण ॥ 7 ॥ जीवित मृतक यही निशानी, दुर्बल देही निर्मल वाणी । दादू भाव भक्ति दीनता अंग, प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥ 8 ॥ तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीवित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 9 ॥ दादू राव रंक सब मरेंगे, जीवै नाहीं कोइ । सोई कहिये जीवता, जे मरजीवा होइ ॥ 10 ॥ दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ । मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥ 11 ॥ वैरी मारे मरि गये, चित तैं बिसरे नाहिं । दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥ 12 ॥ उभै असमाव दादू तो तूं पावै पीव को, जे जीवित मृतक होइ । आप गँवाये पीव मिलै, जानत हैं सब कोइ ॥ 13 ॥ दादू तो तूं पावै पीव का, आपा कुछ न जान । आपा जिस तैं ऊपजै, सोई सहज पिछान ॥ 14 ॥ दादू तो तूं पावै पीव को, मैं मेरा सब खोइ । मैं मेरा सहजैं गया, तब निर्मल दर्शन होइ ॥ 15 ॥ मैं ही मेरे पोट सिर, मरिये ताके भार । दादू गुरु प्रसाद सौं, सिर तैं धरी उतार ॥ 16 ॥
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