सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जीवित मृतक तब साहिब को सिजदा किया, जब सिर धऱ्या उतार । यों दादू जीव्वित मरै, हिर्स हवा को मार ॥ 38 ॥ शूरातन दादू तन मन काम करीम के, आवै तो नीका । जिसका तिसको सौंपिये, सोच क्या जी का ॥ 39 ॥ जे शिर सौंप्या राम को, सो शिर भया सनाथ । दादू दे ऊरण भया, जिसका तिसके हाथ ॥ 40 ॥ जिसका है तिसको चढै, दादू ऊरण होइ । पहली देवै सो भला, पीछे तो सब कोइ ॥ 41 ॥ सांई तेरे नाम पर, शिर जीव करूं कुर्बान । तन मन तुम पर वारणै, दादू पिंड पराण ॥ 42 ॥ अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ? दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥ 43 ॥ शिर के साटै लीजिये, साहिब जी का नांव । खेलै शीश उतार कर, दादू मैं बलि जांव ॥ 44 ॥ खेलै शीश उतार कर, अधर एक सौं आइ । दादू पावै प्रेम रस, सुख में रहै समाइ ॥ 45 ॥ मरण भय निवारण दादू मरणे थीं तूं मत डरै, सब जग मरता जोइ । मिल कर मरणा राम सौं, तो कलि अजरावर होइ ॥ 46 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा अंत निदान । रे मन मरणा सिरजिया, कहले केवल राम ॥ 47 ॥ दादू मरणे थीं तूं मत डरै, मरणा पहुँचा आइ । रे मन मेरा राम कह, बेगा बार न लाइ ॥ 48 ॥
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