भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 242

श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 जे निकसे संसार तैं, सांई की दिशि धाइ। जे कबहुँ दादू बाहुड़े, तो पीछे माऱ्या जाइ ॥ 26 ॥ दादू कोई पीछे हेला जनि करै, आगे हेला आव। आगे एक अनूप है, नहिं पीछे का भाव ॥ 27 ॥ पीछे को पग ना भरै, आगे को पग देइ। दादू यहु मत शूर का, अगम ठौर को लेइ ॥ 28 ॥ आगा चल पीछा फिरै, ताका मुँह मा दीठ। दादू देखे दोइ दल, भागे देकर पीठ ॥ 29 ॥ दादू मरणां माँड कर, रहै नहिं ल्यौ लाइ। कायर भाजै जीव ले, आ-रण छाड़ै जाइ ॥ 30 ॥ शूरा होइ सु मेर उलंधै, सब गुण बँध्या छूटै। दादू निर्भय ह्वै रहे, कायर तिणा न टूटै ॥ 31 ॥ शूर सती साधु निर्णय सर्प केसरी काल कुंजर, बहु जोध मारग मांहि। कोटि में कोई एक ऐसा, मरण आसंघ जाहि ॥ 32 ॥ दादू जब जागै तब मारिये, वैरी जिय के साल। मनसा डायनि, काम रिपु, क्रोध महाबली काल ॥ 33 ॥ पंच चोर चितवत रहैं, माया मोह विष झाल। चेतन पहरै आपने, कर गह खड़ग संभाल ॥ 34 ॥ काया कबज कमान कर, सार शब्द कर तीर। दादू यहु सर सांध कर, मारै मोटे मीर ॥ 35 ॥ काया कठिन कमान है, खांचै विरला कोइ। मारै पंचों मृगला, दादू शूरा सोइ ॥ 36 ॥ जे हरि कोप करै इन ऊपर, तो काम कटक दल जांहि कहाँ। लालच लोभ क्रोध कत भाजैं, प्रगट रहे हरि जहाँ तहाँ ॥ 37 ॥

  • 242 -