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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-शूरातन का अंग 24 कायर मन मनसा जीते नहीं, पंच न जीते प्राण। दादू रिपु जीते नहीं, कहैं हम शूर सुजान ॥ 61 ॥ मन मनसा मारे नहीं, काया मारण जांहि। दादू बांबी मारिये, सर्प मरै क्यों मांहि ॥ 62 ॥ शूरातन दादू पाखर पहर कर, सब को झूझण जाइ। अंग उघाड़ै शूरवां, चोट मुँहैं मुँह खाइ ॥ 63 ॥ जब झूझै तब जाणिये, काछ खड़े क्या होइ। चोट मुँहैं मुँह खाइगा, दादू शूरा सोइ ॥ 64 ॥ शूरातन सहजैं सदा, साच सेल हथियार। साहिब के बल झूझतां, केते लिये सु मार ॥ 65 ॥ दादू जब लग जिय लागैं नहीं, प्रेम प्रीति के सेल। तब लग पिव क्यों पाइये, नहिं बाजीगर का खेल ॥ 66 ॥ दादू जे तूं प्यासा प्रेम का, तो किसको सेतैं जीव। शिर के साटै लीजिये, जे तुझ प्यारा पीव ॥ 67 ॥ दादू महा जोध मोटा बली, सो सदा हमारी भीर। सब जग रूठा क्या करै, जहाँ तहाँ रणधीर ॥ 68 ॥ दादू रहते पहते राम जन, तिन भी माँड्या झूझ। साचा मुँह मोड़ै नहीं, अर्थ इता ही बूझ ॥ 69 ॥ हरि भरोसा दादू काँधे सबल के, निर्बाहेगा और। आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥ 70 ॥ दादू क्या बल कहा पतंग का, जलत न लागै बार। बल तो हरि बलवंत का, जीवै जिहिं आधार ॥ 71 ॥

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