सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 यहु परख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नांहि । अन्तर की जाणैं नहीं, ता तैं खोटा खांहि ॥ 5 ॥ दादू बाहर का सब देखिये, भीतर लख्या न जाइ । बाहर दिखावा लोक का, भीतर राम दिखाइ ॥ 6 ॥ दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ । खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥ 7 ॥ दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाइ सो पवन । राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥ 8 ॥ घट की भान अनीति सब, मन की मेट उपाध । दादू परिहर पंच की, राम कहैं ते साध ॥ 9 ॥ अर्थ आया तब जानिये, जब अनर्थ छूटे । दादू भाँडा भरम का, गिरि चौड़े फूटे ॥ 10 ॥ दादू दूजा कहबे को रह्या, अन्तर डारा धोइ । ऊपर की ये सब कहैं, मांहि न देखै कोइ ॥ 11 ॥ दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास । मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥ 12 ॥ दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव । अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥ 13 ॥ जग जन विपरीत तन मन आत्म एक है, दूजा सब उनहार । दादू मूल पाया नहीं, दुविधा भ्रम विकार ॥ 14 ॥ काया के सब गुण बँधे, चौरासी लख जीव । दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥ 15 ॥ काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनन्त अपार । दादू काया वश करै, निरंजन निराकार ॥ 16 ॥
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