सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-पारिख का अंग 27 पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक। काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥ 17 ॥ नरबिड़ रूप पशु मति बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशु समान। समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥ 18 ॥ सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिलैं तब देव। ब्रह्म मिलै तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥ 19 ॥ करतूती कर्म दादू बँध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान। दादू दोनों देखिये, दूजा नांही आन ॥ 20 ॥ कर्मों के वश जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म। जहँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू भागा भ्रम ॥ 21 ॥ पारिख अपारिख काचा उछलै ऊफणै, काया हाँडी मांहि। दादू पाका मिल रहै, जीव ब्रह्म द्वै नांहि ॥ 22 ॥ दादू बाँधे सुर नवाये बाजैं, एह्वा शोध रु लीज्यो। राम स्नेही साधु हाथे, वेगा मोकल दीज्यो ॥ 23 ॥ प्राण जौहरी पारिखु, मन खोटा ले आवै। खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 24 ॥ सांच श्रवणां हैं, नैनां नहीं, तातैं खोटा खाहिं। ज्ञान विचार न उपजै, साच झूठ समझाहिं ॥ 25 ॥ सांच दादू साचा लीजिये, झूठा दीजे डार। साचा सन्मुख राखिये, झूठा नेह निवार ॥ 26 ॥
- 265 -