सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-सुन्दरी का अंग 30 सखी सुहागिन सब कहैं, प्रकट न खेलै पीव। सेज सुहाग न पाइये, दुखिया मेरा जीव ॥ 16 ॥ अन्य लग्न व्यभिचार पुरुष पुरातन छाड़ कर, चली आन के साथ। सो भी संग तैं बीछुट्या, खड़ी मरोड़े हाथ ॥ 17 ॥ सुन्दरी विलाप सुन्दरी कबहुँ कंत का, मुख सौं नाम न लेइ। अपने पीव के कारणैं, दादू तन मन देइ ॥ 18 ॥ नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण। दादू सुन्दरी बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥ 19 ॥ तन भी तेरा, मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण। सब कुछ तेरा, तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥ 20 ॥ सुन्दरी मोहे पीव को, बहुत भाँति भरतार। त्यों दादू रिझवै राम को, अनन्त कला करतार ॥ 21 ॥ नदियाँ नीर उलंघ कर, दरिया पैली पार। दादू सुन्दरी सो भली, जाइ मिले भरतार ॥ 22 ॥ सुन्दरी सुहाग प्रेम लहर गह ले गई, अपने प्रीतम पास। आत्म सुन्दरी पीव को, विलसै दादू दास ॥ 23 ॥ सुन्दरी को साँई मिल्या, पाया सेज सुहाग। पींव सौं खेलै प्रेम रस, दादू मोटे भाग ॥ 24 ॥ दादू सुन्दरी देह में, साँई को सेवै। राती अपने पीव सौं, प्रेम रस लेवै ॥ 25 ॥ दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह। दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥ 26 ॥
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