भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-बेली का अंग 36 जे साहिब सींचै नहीं, तो बेली कुम्हलाइ । दादू सींचै सांइयाँ, तो बेली बधती जाइ ॥ 5 ॥ हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार । दादू लागै अमर फल, कोइ साधू सींचनहार ॥ 6 ॥ दादू सूखा रूंखड़ा, काहे न हरिया होइ । आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥ 7 ॥ कदे न सूखै रूंखड़ा, जे अमृत सींच्या आप । दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापै ताप ॥ 8 ॥ जे घट रोपै राम जी, सींचै अमी अघाइ । दादू लागै अमर फल, कबहूँ सूख न जाइ ॥ 9 ॥ दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं । सूखै खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥ 10 ॥ दादू बहुगुणवंती बेलि है, ऊगी कालर मांहिं । सींचै खारे नीर सौं, तातैं निपजै नांहिं ॥ 11 ॥ बहुगुणवंती बेली है, मीठी धरती बाहि । मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥ 12 ॥ अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ । अमृत का फल खाइ कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ 13 ॥ दादू विष की बेली बाहिये, विष ही का फल होइ । विष ही का फल खाय कर, अमर नहिं कलि कोइ ॥ 14 ॥ सतगुरु संगति नीपजै, साहिब सींचनहार । प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फलै अपार ॥ 15 ॥ दया धर्म का रूंखड़ा, सत सौं बधता जाइ । संतोंष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥ 16 ॥

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