भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 308

श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1

  1. विरह विलाप । पंचमताल विरहनी को श्रृंगार न भावे, है कोई ऐसा राम मिलावे ॥ टेक ॥ विसरे अंजन मंजन चीरा, विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥ 1 ॥ नव-सत थाके सकल श्रृंगारा, है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥ 2 ॥ देह गेह नहीं सुधि शरीरा, निशदिन चितवत चातक नीरा ॥ 3 ॥ दादू ताहि न भावे आन, राम बिना भई मृतक समान ॥ 4 ॥

  2. करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल अब तो मोहि लागी बाइ, उन निश्चल चित्त लियो चुराइ ॥ टेक ॥ आन न रुचै और नहीं भावै, अगम अगोचर तहँ मन जाइ। रूप न रेख वर्ण कहूँ कैसा, तिन चरणों चित्त रह्या समाइ ॥ 1 ॥ तिन चरणों चित्त सहज समाना, सो रस भीना तहँ मन धाइ। अब तो ऐसी बन आई, विष तजैं अरु अमृत खाइ ॥ 2 ॥ कहा करूँ, मेरा वश नांही, और न मेरे अंग सुहाइ। पल इक दादू देखन पावै, तो जन्म जन्म की तृषा बुझाइ ॥ 3 ॥

  3. करुणा विनती । पंजाबी त्रिताल तूँ जनि छाड़ै केशवा, मेरे और निवाहनहार हो ॥ टेक ॥ अवगुण मेरे देखकर, तूँ ना करि मैला मन। दीनानाथ दयाल है, अपराधी सेवक जन हो ॥ 1 ॥ हम अपराधी जन्म के, नखशिख भरे विकार। मेट हमारे अवगुणा, तूँ गरवा सिरजनहार हो ॥ 2 ॥ मैं जन बहुत बिगारिया, अब तुम ही लेहु सँवार । समर्थ मेरा सांइयाँ, तूँ आपै आप उधार हो ॥ 3 ॥ तूँ न विसारी केशवा, मैं जन भूला तोहि। दादू को और निवाह ले, अब जनि छाड़े मोहि हो ॥ 4 ॥

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