भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 ४. विरह चिन्ता । गजताल सो दिन कबहूँ आवेगा, दादूड़ा पीव पावेगा ॥ टेक ॥ क्यूं ही अपने अंग लगावेगा, तब सब दुख मेरा जावेगा ॥ 1 ॥ पीव अपने बैन सुनावेगा, तब आनंद अंग न मावेगा ॥ 2 ॥ पीव मेरी प्यास मिटावेगा, तब आपहि प्रेम पिलावेगा ॥ 3 ॥ दे अपना दर्श दिखावेगा, तब दादू मंगल गावेगा ॥ 4 ॥ ९. विरह प्रीति । पंचम ताल तैं मन मोह्यो मोर रे, रह न सकूँ हौं राम जी ॥ टेक ॥ तोरे नांव चित लाइया रे, औरन भया उदास। साँईं ये समझाइया, हौं संग न छाडूं पास रे ॥ 1 ॥ जाणूं तिलहि न बिछुटूं रे, जनि पछतावा होइ। गुण तेरे रसना जपूं, सुणसी साँई सोइ रे ॥ 2 ॥ भोरे जन्म गँमाइया रे, चीन्हा नहीं सो सार। अजहूँ यह अचेत है, और नहीं आधार रे ॥ 3 ॥ पीव की प्रीत तो पाइये रे, जो सिर होवे भाग। यो तो अनत न जाइसी, रहसी चरणहुँ लाग रे ॥ 4 ॥ अनतैं मन निवारिया रे, मोहि एकै सेती काज। अनत गये दुख ऊपजै, मोहि एकै सेती राज रे ॥ 5 ॥ साँईं सौं सहजैं रमूँ रे, और नहीं आन देव। तहाँ मन विलंबिया, जहाँ अलख अभेव रे ॥ 6 ॥ चरण कमल चित लाइया रे, भोरैं ही ले भाव। दादू जन अचेत है, सहजैं ही तूँ आव रे ॥ 7 ॥

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